अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 379 of 1063
Read in contextस्थापित करो. हमारे शरीरों में स्थित हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप है, उसे भी हम से अलग
करो और नष्ट कर दो. (२)
सूक्त-४४ देवता—वाक्
शिवास्त एका अशिवास्त एकाः सर्वा बिभर्षि सुमनस्यमानः.
तिस्रो वाचो निहिता अन्तरस्मिन् तासामेका वि पपातानु घोषम्.. (१)
हे अकारण निंदित पुरुष! तेरे विषय में कुछ वाणियां स्तुति रूपा एवं कल्याणी हैं तथा
कुछ वाणियां तेरे विषय में निंदापूर्ण हैं. सौमनस्य का आचरण करती हुई इन दो प्रकार की
वाणियों के अतिरिक्त तीन वाणियां अर्थात् परा, पश्यंती और मध्यमा-इस शब्द प्रयोग में
शरीर के भीतर छिपी रहती हैं. केवल एक अर्थात् वैखरी वाणी ध्वनि के रूप में निकलती है.
(१)
सूक्त-४५ देवता—इंद्र
उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनयोः.
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्.. (१)
हे इंद्र और विष्णु! तुम दोनों सर्वदा विजयी बनो और किसी से कभी पराजित न होओ.
इन दोनों में से एक भी दूसरे से पराजित नहीं होता. हे इंद्र और विष्णु! तुम दो असुरों के साथ
जिस वस्तु की स्पर्धा करते हो, वह वस्तु लोक, वेद और वाणी के रूप में स्थित हो कर हजारों
से भी बढ़कर हो. (१)
सूक्त-४६ देवता—ईर्ष्या
जनाद् विश्वजनीनात् सिन्धुतस्पर्याभृतम्.
दूरात् त्वा मन्य उद्भृतमीर्ष्याया नाम भेषजम्.. (१)
ईर्ष्या समाप्त करने वाली जड़ीबूटी को संबोधित कर के कहा जा रहा है— सभी जनों
के हितकारक जनपद से तथा सागर से लाई हुई को एवं दूर देश से उखाड़ कर लाई तुझ,
सक्तुमंथ नामक जड़ीबूटी को मैं क्रोध का निवारण करने वाली मानता हूं. (१)
सूक्त-४७ देवता—ईर्ष्या
अग्नेरिवास्य दहतो दावस्य दहतः पृथक्.
एतामेतस्येष्यार्मुदग्निमिव शमय.. (१)
जिस प्रकार अग्नि वस्तुओं को जलाती है, उसी प्रकार क्रोध के कारण मेरे कार्य
ebook converter DEMO Watermarks*