अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-१९ देवता—पृथिवी, पर्जन्य
प्र नभस्व पृथिवि भिन्द्धी ३ दं दिव्यं नभः.
उदनो दिव्यस्य नो धातरीशानो वि ष्या दृतिम्.. (१)
हे पृथ्वी! बादल फसल की वृद्धि के लिए तुझ पर महती वर्षा करेंगे. उस वर्षा के कारण
तू दृढ़ बन. आकाश में उत्पन्न होने वाला यह बादल पृथ्वी को विदीर्ण करे. हे धाता! आकाश
में होने वाले जल का भाग हमें प्रदान करो. तुम वर्षा प्रदान करने में समर्थ मेघरूपी जलपूर्ण
मशक को छोड़ो अर्थात् महती वर्षा करो. (१)
न घ्रंस्तताप न हिमो जघान प्र नभतां पृथिवी जीरदानुः.
आपश्चिदस्मै घृतमित् क्षरन्ति यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम्.. (२)
ग्रीष्म ऋतु हमें संताप न दे और शीत ऋतु हमें कांपने की बाधा न पहुंचाए. अत्यधिक
दान देने वाली पृथ्वी वर्षा से भीग जाए. इस यजमान के लिए जल भी प्रसन्नता कारक हों.
जहां सोम नामक देव हैं, उस देश में सदा ही कल्याण होता है. (२)
सूक्त-२० देवता—प्रजापति, धाता
प्रजापतिर्जनयति प्रजा इमा धाता दधातु सुमनस्यमानः.
संजानानाः संमनसः सयोनयो मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु.. (१)
प्रजापति इस पुत्र, पौत्र आदि रूप प्रजा को उत्पन्न करें तथा अनुकूल मन वाले धाता
इस प्रजा का पोषण करें. ये प्रजाएं समान ज्ञान वाली, मिले हुए मन वाली और समान कारण
वाली हों. पुष्टपति नाम के देव मुझे प्रजा विषयक पोषण प्रदान करें. (१)
सूक्त-२१ देवता—अनुमति
अन्वद्य नो ऽ नुमतिर्यज्ञं देवेषु मन्यताम्.
अग्निश्च हव्यवाहनो भवतां दाशुषे मम.. (१)
सभी कर्मों की अनुमति देने वाली पौर्णमासी की देवी हमारा यज्ञ इस समय देवों को
बताएं. अग्नि देव भी मुझ यजमान की हवि देवों को प्राप्त कराने वाले हों. (१)
अन्विदनुमते त्वं मंससे शं च नस्कृधि.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः.. (२)
हे अनुमति नामक देवी! तुम हमें अनुमति दो तथा हमें सुख प्राप्त कराओ. तुम सामने
आ कर अग्नि में डाला हुआ हमारा हवि स्वीकार करो. हे देवि! पुत्र, पौत्र आदि रूप हमारी
प्रजा की रक्षा करो. (२)
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