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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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सातवां कांड
सूक्त-१ देवता—आत्मा
धीती वा ये अनयन् वाचो अग्रं मनसा वा ये ऽ वदन्नृतानि.
तृतीयेन ब्रह्मणा वावृधानास्तुरीयेणामन्वत नाम धेनोः.. (१)
प्रजापति अथवा इंद्र और अग्नि की स्तुति करने वालों ने वाणी व्यवहार के समस्त अर्थ
का ध्यान किया. जिन कहने के इच्छुकों ने देवता वाचक शब्दों के रूप में सत्य बोला, उन्होंने
तृतीय ब्रह्म अर्थात् मध्यमा नामक भाषा शक्ति के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए चौथी अर्थात्
वैखरी वाणी से प्रसन्न होने वाले प्रजापति का नाम उच्चारण किया. (१)
स वेद पुत्रः पितरं स मातरं स सूनुर्भुवत् स भुवत् पुनर्मघः.
स द्यामौर्णोदन्तरिक्षं स्व १: स इदं विश्वमभवत् स आभवत्.. (२)
भलीभांति जानने वाले पुत्रों को अनर्थ से बचाने वाला प्रजापति द्युलोक तथा पृथ्वी को
जानता है. वह प्रजापति संसार के लोगों को अपनेअपने कर्म करने की प्रेरणा देता है. वह
आकाश तथा पृथ्वी को अपनी महिमा से व्याप्त करता है. वह प्रजापति ही यह दिखाई देता
हुआ विश्व बन गया है. (२)
सूक्त-२ देवता—आत्मा
अथर्वाणं पितरं देवबन्धुं मातुर्गर्भं पितुरसुं युवानम्.
य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (१)
प्रजाओं के पालक देवों की सृष्टि करने वाले, माता के गर्भ से जन्म लेने वाले बालक को
युवा बनाने वाले एवं गर्भ के जनक को प्राण युक्त करने वाले प्रजापति से मैं अपनी
अभिलाषा की सिद्धि के लिए याचना करता हूं. उस ने इस ज्योतिहोम आदि यज्ञ को मन से
जाना है. हे ब्रह्म! उस प्रजापति को मुझे बताओ. इस बात की अभिलाषा पूर्ण करने वाले यज्ञ
कर्म में बताओ. (१)
सूक्त-३ देवता—आत्मा
अया विष्ठा जनयन् कर्वराणि स हि घृणिरुरुर्वराय गातुः.
स प्रत्युदैद् धरुणं मध्वो अग्रं स्वया तन्वा तन्वमैरयत.. (१)
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