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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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काठ के चरण बंधन से छूटने अथवा पसीने से भीगा हुआ स्नान कर के मैल से मुक्त
होने से पवित्र होता है अथवा घी जिस प्रकार कपड़े से छानने पर शुद्ध होता है, उसी प्रकार
विश्वे देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (३)
सूक्त-११६ देवता—विवस्वान
यद् यामं चक्रुर्निखनन्तो अग्रे कार्षीवणा अन्नविदो न विद्यया.
वैवस्वते राजनि तज्जुहोम्यथ यज्ञियं मधुमदस्तु नो ऽ न्नम्.. (१)
खेती करने वाले किसानों ने प्राचीनकाल में भूमि को खोदते हुए जो यम संबंधी क्रूर
कर्म किया था, वे बुरे और भले काम में विभाजन न करने के कारण जानकार नहीं थे. घृत,
मधु, तेल से युक्त अन्न हम अदिति पुत्र देवों और यमराज के लिए हवन करते हैं. इस के
पश्चात वह यज्ञ योग्य अन्न मधुरता युक्त तथा हमारे भोग करने योग्य है. (१)
वैवस्वतः कृणवद् भागधेयं मधुभागो मधुना सं सृजाति.
मातुर्यदेन इषितं न आगन् यद् वा पितापराद्धो जिहीडे.. (२)
विवस्वान अर्थात् सूर्य के पुत्र यमराज अपने लिए हवि का भाग करें तथा माधुर्य से युक्त
उस भाग को हमें प्रदान करें. माता के पास से जो पाप हम अपराध करने वालों के पास
आया है अथवा पिता हमारे द्वारा किए गए अपराध से क्रोधित है, वह पाप भी शांत हो. (२)
यदीदं मातुर्यदि वा पितुर्नः परि भ्रातुः पुत्राच्चेतस एन आगन्.
यावन्तो अस्मान् पितरः सचन्ते तेषां सर्वेषां शिवो अस्तु मन्युः.. (३)
दिखाई देता हुआ यह पाप यदि हमारे मातापिता, भाई, किसी परिजन, पुत्र अथवा
आत्मीय व्यक्ति के पास से आया है, उस पाप के कारण क्रोधित जितने पितर हमारे समीप
आते हैं, उन सब का क्रोध शांत हो. (३)
सूक्त-११७ देवता—अग्नि
अपमित्यमप्रतीत्तं यदस्मि यमस्य येन बलिना चरामि.
इदं तदग्ने अनृणो भवामि त्वं पाशान् विचृतं वेत्थ सर्वान्.. (१)
मैं ही इस प्रकार का ऋणी हूं जो ऋण लेने के बाद धनी को नहीं लौटाता हूं. उसी
शक्तिशाली ऋण के कारण मैं शासक यम के वश में रहता हूं. हे अग्नि, तुम्हारे प्रभाव से मैं
उस ऋण से छूट गया हूं. मैं ऋण न चुकाने के कारण होने वाले पारलौकिक पाशों से छूट
जाऊंगा. (१)
इहैव सन्तः प्रति दद्म एनज्जीवा जीवेभ्यो नि हराम एनत्.
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