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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 340 of 1063

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Page 340

उन्मुञ्च पाशांस्त्वमग्न एषां त्रयस्त्रिभिरुत्सिता येभिरासन्.
स ग्राह्याः पाशान् वि चृत प्रजानन् पितापुत्रौ मातरं मुञ्च सर्वान्.. (२)
हे अग्नि! माता, पिता और पुत्र को वेदना के दोष रूपी पाश बंधनों से छुड़ाओ. वेदना
के दोष उत्तम, मध्यम और अधम—तीन प्रकार के हैं. हे अग्नि! तुम इस को छुड़ाने के उपाय
जानते हो, इसलिए पकड़ने वाली पिशाची के बंधन की रस्सियां छुड़ाओ. इस के बंधन छुड़ाने
के लिए तुम्हें सभी देव अनुमति दें. (२)
येभिः पाशैः परिवित्तो विबद्धो ऽ ङ्गेअङ्ग अर्पित उत्सितश्च.
वि ते मुच्यन्तां विमुचो हि सन्ति भ्रूणघ्नि पूषन् दुरितानि मृक्ष्व.. (३)
बड़े भाई से पहले विवाह कराने वाला छोटा भाई जिन पाप रूप पाशों से प्रत्येक अंग में
बंधा, रोगी एवं अशांत स्थिति वाला है; उस के वे पाश छूट जाएं. क्योंकि इंद्र आदि सभी देव
छुड़ाने वाले हैं; हे देव! इस भ्रूण हंता को उन पापों से छुड़ाओ जो इसे बड़े भाई से पहले
विवाह करने से प्राप्त हुए हैं. (३)
सूक्त-११३ देवता—पूषा
त्रिते देवा अमृजतैतदेनस्त्रित एनन्मनुष्येषु ममृजे.
ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु.. (१)
अपने बड़े भाई से पहले विवाह करने से संबंधित पाप को प्राचीन काल के देवों ने त्रित
में विसर्जित कर दिया था. त्रित ने अपने में विसर्जित पाप को मनुष्यों में स्थापित कर दिया. हे
बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले! इस कारण यदि ग्रहणशील पाप देवता ग्राही ने तुम्हें
प्राप्त किया है, उसे देवगण मंत्र से नष्ट कर दें. (१)
मरीचीर्धूम्रान् प्र विशानु पाप्मन्नुदारान् गच्छोत वा नीहारान्.
नदीनां फेनाँ अनु तान् वि नश्य भ्रूणघ्नि पूषन् दुरितान मृक्ष्व.. (२)
हे बड़े भाई से पहले विवाह करने से उत्पन्न पाप देवता! तू परिवित्ती अर्थात् बड़े भाई से
पहले विवाह करने वाले को त्याग कर अग्नि, सूर्य आदि में, चमस में अथवा अग्नि से उत्पन्न
धुएं में अथवा उस से बने बादलों में प्रवेश कर जा अथवा तू कोहरे में मिल जा. हे पाप देवता!
तू नदियों के जल में प्रवेश कर के विविध प्रकार से गति कर. (२)
द्वादशधा निहितं त्रितस्यापमृष्टं मनुष्यैनसानि.
ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु.. (३)
त्रित के पाप को बारह स्थानों पर रखा गया. पहले मनुष्य में, उस के बाद तीन आप्तियों
में, इस के पश्चात सूर्योदय की आठ दिशाओं में—इस प्रकार वह पाप बारह स्थानों पर रखा
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