अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in context(२)
ऐनान् द्यतामिन्द्राग्नी सोमो राजा च मेदिनौ.
इन्द्रो मरुत्वानादानममित्रेभ्यः कृणोतु नः.. (३)
हमारे द्वारा दिए गए हवि से प्रसन्न होने वाले इंद्र और अग्नि हमारे इन शत्रुओं को बांधें
तथा राजा सोम इन्हें बांधें. मरुद्गणों के सहित इंद्र हमारे शत्रुओं का पाश बंधन करें. (३)
सूक्त-१०५ देवता—कास
यथा मनो मनस्केतैः परापतत्याशुमत्.
एवा त्वं कासे प्र पत मनसोऽनु प्रवाव्यम्.. (१)
जिस प्रकार मन के द्वारा जाने जाते हुए दूरस्थ विषयों के साथ पुरुष शीघ्रता से ध्रुव
मंडल तक जाता है, उसी प्रकार हे खांसी और कफ रोग वाली कृत्व! तू मन के वेग से पुरुष
के शरीर से निकल कर दूर देश में चली जा. (१)
यथा बाणः सुसंशितः परापतत्याशुमत्.
एवा त्वं कासे प्र पत पृथिव्या अनु संवतम्.. (२)
जिस प्रकार अच्छी तरह तेज किया हुआ बाण धनुष से छूट कर शीघ्र ही भूमि को
छेदता हुआ गिरता है. हे खांसी! तू उसी प्रकार बाण से बिंधी हुई पृथ्वी को लक्ष्य कर के इस
पुरुष से दूर चली जा. (२)
यथा सूर्यस्य रश्मयः परापतन्त्याशुमत्.
एवा त्वं कासे प्र पत समुद्रस्यानु विक्षरम्.. (३)
जिस प्रकार सूर्य की किरणें लोक परलोक तक शीघ्र जाती हैं. हे खांसी! तू उस देश को
लक्ष्य कर के चली जा, जिस देश में सागर के जल के विविध प्रवाह हैं. (३)
सूक्त-१०६ देवता—दूर्वा
आयने ते परायणे दूर्वा रोहतु पुष्पिणीः.
उत्सो वा तत्र जायतां हृदो वा पुण्डरीकवान्.. (१)
हे अग्नि! तुम्हारे अभिमुख जाने में अथवा पराङ्मुख जाने में हमारे देश में पुष्प युक्त
कोमल दूर्वा उत्पन्न हो. हमारे घर और खेत में पानी के सोते उत्पन्न हों तथा कमलों वाला
सरोवर निर्मित हो. (१)
अपामिदं नयनं समुद्रस्य निवेशनम्.
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