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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 333 of 1063

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Page 333

आ वृषायस्व श्वसिहि वर्धस्व प्रथयस्व च.
यथाङ्गं वर्धतां शेपस्तेन योषितमिज्जहि.. (१)
हे पुरुष! तू सांड़ के समान गर्भाधान समर्थ हो एवं जीवित रहे. तेरे अंगों का विकास हो
और तेरा शरीर विस्तीर्ण हो. जैसे तेरी जननेंद्रिय बढ़े, वैसे ही तू संभोग की इच्छुक नारी के
समीप जा. (१)
येन कृशं वाजयन्ति येन हिन्वन्त्यातुरम्.
तेनास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पस:.. (२)
जिस रस के द्वारा वीर्यरहित पुरुष को प्रजनन समर्थ बनाया जाता है, जिस रस के द्वारा
रोगी पुरुष को प्रसन्न किया जाता है, हे मंत्रसमूह के पालक देव! उसी रस विशेष से इस पुरुष
की इंद्रिय को धनुष के समान विस्तृत करो. (२)
आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्विनि.
क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (३)
हे वीर्य के इच्छुक! हम तेरी पुरुषेंद्रिय को धनुष की डोरी के समान विस्तृत करते हैं. तू
गर्भाधान में समर्थ बैल के समान प्रसन्न मन से अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (३)
सूक्त-१०२ देवता—अश्विनीकुमार
यथायं वाहो अश्विना समैति सं च वर्तते.
एवा मामभि ते मनः समैतु सं च वर्तताम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! भलीभांति सिखाया हुआ घोड़ा जिस प्रकार सवार की इच्छा के
अनुसार चलता है और उस के अधीन रहता है. हे कामिनी! उसी प्रकार तेरा मन मुझ कामुक
को लक्ष्य कर के आए और मेरे अधीन रहे. (१)
आहं खिदामि ते मनो राजाश्वः पृष्ट्यामिव.
रेष्मच्छिन्नं यथा तृणं मयि ते वेष्टतां मनः.. (२)
हे कामिनी! मैं तेरे मन को इस प्रयोग के द्वारा उसी प्रकार अपने अनुकूल बनाता हूं,
जिस प्रकार श्रेष्ठ अश्व लगाम को चबाता है. हे कामिनी! वायु के द्वारा छिन्नभिन्न तिनका जिस
प्रकार घूमता है, उसी प्रकार तेरा मन मेरे अधीन हो कर भ्रमण करे. (२)
आज्जनस्य मदुघस्य कुष्ठस्य नलदस्य च.
तुरो भगस्य हस्ताभ्यामनुरोधनमुद्धरे.. (३)
हे नारी! मैं सौभाग्यकारी देव के शीघ्रता करते हुए हाथों के द्वारा त्रिककुद पर्वत पर
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