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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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के फलस्वरूप धन में स्थापित करें. अग्नि देव की कृपा से हम अपने पुत्र, पौत्र आदि के साथ
भोजन करने वाले बनें. (१)
विश्वे देवा मरुत् इन्द्रो अस्मानस्मिन् द्वितीये सवने न जह्युः.
आयुष्मन्तः प्रियमेषां वदन्तो वयं देवानां सुमतौ स्याम .. (२)
सभी देश, दान आदि गुण वाले उनचास मरुत् और उन के स्वामी इंद्र मध्याह्न सवन
नामक सोमयाग में हम ऋत्विजों को न छोड़ें. हम उन देवों को प्रसन्न करने वाली स्तुतियां
बोलते हुए देवों की अनुग्रह बुद्धि में स्थित हों. (२)
इदं तृतीयं सवनं कवीनामृतेन ये चमसमैरयन्त.
ते सौधन्वनाः स्व रानशानाः स्विष्टिं नो अभि वस्यो नयन्तु.. (३)
तृतीय सवन नाम का यह सोम याग उन ऋभुओं का है, जिन्होंने अपने शिल्प कर्म से
चमस की रचना की थी. आंगिरस के पुत्र वे सुधन्वा रथ, चमस आदि बनाने के कारण देवत्व
को प्राप्त हुए हैं. वे ऋभु उत्तम फल का ध्यान कर के हम को यज्ञ पूर्ति का अधिकारी बनाएं.
(३)
सूक्त-४८ देवता—मंत्र में बताए गए
श्येनो ऽ सि गायत्रच्छन्दा अनु त्वा रभे.
स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा.. (१)
हे बाज के समान शीघ्र गति वाले प्रातःसवन नामक यज्ञ! तेरे स्तोत्र में गायत्री छंद है. मैं
तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण करता हूं, इसीलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को मेरे
पास ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो. (१)
ऋभुरसि जगच्छन्दा अनु त्वा रभे.
स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा.. (२)
हे तृतीय सवन वाले यम! तेरी स्तुतियों में जगती छंद का अधिक प्रयोग होने से तेरा
नाम जगच्छंद है तथा तू आंगिरस के पुत्र सुधन्वा को प्रसन्न करने के कारण ऋभु कहलाता है.
मैं ने तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण किया है, इसलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को
मेरे समीप ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो. (२)
वृषासि त्रिष्टुप्छन्दा अनु त्वा रभे.
स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा.. (३)
हे मध्याह्न सवन! तू सेचन समर्थ इंद्र ही है. तेरी स्तुतियों में त्रिष्टुप् छंद की अधिकता है,
इसीलिए तू त्रिष्टुप् छंद कहलाता है. मैं तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण करता हूं,
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