अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextभूमिका
महाभाष्य के रचयिता महर्षि पतंजलि ने अथर्ववेद की नौ संहिताओं का उल्लेख किया
है—
नवधाऽथर्वाणोवेदः.
इस का तात्पर्य यह है कि पतंजलि के समय अथर्ववेद की नौ संहिताएं उपलब्ध थीं.
पतंजलि का समय २०० ईसा पूर्व से १५० ईसा पूर्व तक माना जाता है. इन संहिताओं के
नाम इस प्रकार हैं—
(१) पिप्लाद, (२) स्तोद अथवा तोद, (३) मोद, (४) शौनकीय, (५)
जावल, (६) जलद, (७) ब्रह्मदेव (८) देवदर्श (९) चारणवैद्य.
आजकल तीन संहिताएं उपलब्ध हैं—पिप्लाद, मोद और शौनक. इन में शौनक संहिता
का आजकल बहुत प्रचार है. मैं ने जो अनुवाद प्रस्तुत किया है, उस का आधार शौनक
संहिता ही है.
शौनक संहिता में २० कांड, ७३१ सूक्त तथा ५९८७ मंत्र हैं. अथर्ववेद की शौनक संहिता
के कांडों की स्थिति इस प्रकार है—
आरंभ के सात कांडों में छोटेछोटे सूक्त हैं. प्रथम कांड के प्रत्येक सूक्त में ४ मंत्र,
द्वितीय कांड के प्रत्येक सूक्त में ५ मंत्र, तृतीय कांड के प्रत्येक सूक्त में ६ मंत्र,
चतुर्थ कांड के प्रत्येक सूक्त में ७ मंत्र तथा पंचम कांड के प्रत्येक सूक्त में ८ मंत्र
हैं. षष्ठ कांड में १४२ सूक्त हैं और प्रत्येक सूक्त में कम से कम तीन मंत्र हैं. सप्तम
कांड में ११८ सूक्त हैं. इन में अधिकांश सूक्त एक अथवा दो मंत्रों वाले हैं. आठवें
से ले कर बारहवें कांड तक अधिक मंत्रों वाले बड़े सूक्त हैं. तेरहवें से अठारहवें
कांड तक भी अधिक मंत्रों वाले सूक्त हैं. सत्रहवें कांड में ३० मंत्रों का केवल एक
सूक्त है. उन्नीसवें कांड में ७२ सूक्त हैं और बीसवें कांड में १४३ सूक्त हैं.
अथर्ववेद में ऋग्वेद से लिए गए मंत्रों की संख्या १२०० है.
ऋग्वेद की विषय वस्तु
डा. उमाशंकर शर्मा ऋषि ने अपने 'संस्कृत साहित्य का इतिहास' में अथर्ववेद
की विषय वस्तु का वर्णन करते हुए लिखा है—
“प्रथम कांड में विविध रोगों की निवृत्ति, बंधन से मुक्ति, राक्षसों का विनाश,
सुख प्राप्ति आदि का निरूपण है. द्वितीय कांड में रोग, शत्रु एवं कृमिनाश तथा
दीर्घायुष्य की प्रार्थना है. तृतीय कांड में शत्रुसेना का सम्मोहन, राजा का
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