अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअपने मन में मिलाते हैं. (३)
सूक्त-४४ देवता—मंत्र में उक्त
अस्थाद् द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थाद् विश्वमिदं जगत्.
अस्थुर्वृक्षा ऊर्ध्वस्वप्रास्तिष्ठाद् रोगो अयं तव.. (१)
हे रोगी पुरुष! जिस प्रकार गृह नक्षत्रों से युक्त द्युलोक में स्थित है, जिस प्रकार सब की
आधार बनी हुई पृथ्वी स्थित है, जिस प्रकार यह दिखाई देता हुआ जगत् स्थित है, जिस
प्रकार खड़े एवं सोने वाले वृक्ष ऊपर की ओर स्थित हैं, उसी प्रकार तेरा यह रक्त बहने का
रोग स्थित हो, अर्थात् तेरा रक्त प्रवाह रुक जाए. (१)
शतं या भेषजानि ते सहस्रं संगतानि च.
श्रेष्मास्रावभेषजं वसिष्ठं रोगनाशनम्.. (२)
हे रोगी पुरुष! जो सैकड़ों अथवा हजारों संख्या वाली ओषधियां रोग शांत करती हैं,
यह कर्म उन सब में श्रेष्ठ एवं रक्तस्राव दूर करने वाला है. (२)
रुद्रस्य मूत्रमस्यमृतस्य नाभिः.
विषाणका नाम वा असि पितॄणां मूलादुत्थिता वातीकृतनाशनी.. (३)
हे गाय के सींग से निकले हुए जल! तू रुद्र का मूत्र तथा अमृत का बंधक है. हे गाय के
सींग! तू विषाण नाम के रोग को शांति की सूचना देता है. तू पितरों के मूल से उत्पन्न तथा
रक्तस्राव के आधार पाप का नाश करने वाला है. (३)
सूक्त-४५ देवता—दुःस्वप्न विनाश
परो ऽ पेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि.
परेहि न त्वा कामये वृक्षां वनानि सं चर गृहेषु गोषु मे मनः.. (१)
हे पापमय अशक्त मन! तू हम से दूर चला जा. तू अशोभन बातें मुझ तक क्यों लाता
है? तू दूर चला जा. मैं तुझे नहीं चाहता. यहां से दूर जा कर तू घने वृक्षों वाले वन में प्रवेश कर
और वहीं रह. मेरा शोभन मन पत्नी, पुत्र आदि से युक्त घर में और गौ आदि पशुओं में संलग्न
रहे. (१)
अवशसा निःशसा यत् पराशसोपारिम जाग्रतो यत् स्वप्नतः.
अग्निर्विश्वान्यप दुष्कृतान्यजुष्टान्यारे अस्मद् दधातु.. (२)
सामान्य हिंसा, अत्यधिक हिंसा तथा मुंह फेरने वालों की हिंसा के द्वारा जाग्रत अवस्था
में हम जिस बुरे स्वप्न से पीड़ित होते हैं, निद्रावस्था में भी वही बुरा स्वप्न हम को पीड़ित करता
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