अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतस्यै हिरण्यद्रापये ऽ रात्य अकरं नमः.. (१०)
यह सुनहरे रंग वाली पृथ्वी व्याप्ति के कारण हिरण्यकश्यप के वश में हो कर समृद्धहीन
हो गई थी. यह असमृद्धि रमणीयता का विनाश करती है. मैं इस को नमस्कार करता हूं. (१०)
सूक्त-८ देवता—अग्नि
वैकङ्कतेनेध्मेन देवेभ्य आज्यं वह.
अग्ने ताँ इह मादय सर्व आ यन्तु मे हवम्.. (१)
हे अग्नि! तुम शक्तिशाली ओषधि के ईंधन से देवों के हेतु घृत का वहन करो. इस कर्म
से तुम देवों को प्रसन्न करो. मेरे यह में सभी देव आएं. (१)
इन्द्रा याहि मे हवमिदं करिष्यामि तच्छृणु.
इम ऐन्द्रा अतिसरा आकूतिं सं नमन्तु मे.
तेभिः शकेम वीर्यं १ जातवेदस्तनूवशिन्.. (२)
हे इंद्र! मेरे इस यज्ञ में आओ और मैं जो स्तुति कर रहा हूं, उसे सुनो. सभी ऋत्विज् मेरी
इच्छा के अनुसार कार्य करें. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता इंद्र! जिन ऋत्विजों का मैं ने वर्णन
किया है, उन के प्रयत्न से हम शक्तिशाली बनें. (२)
यदसावमृतो देवा अदेवः संश्रिकीर्षति.
मा तस्याग्निर्हव्यं वाक्षीद्भवं देवा अस्य मोप गुर्ममैव हवमेतन.. (३)
हे देवगण! जो भक्तिहीन पुरुष यज्ञ करना चाहता है, उस के हव्य को अग्नि तुम्हारे पास
तक न पहुंचाएं. देवगण उस भक्ति हीन पुरुष के यज्ञ में न जा कर मेरे यज्ञ में पधारें. (३)
अति धावतार्तिसरा इन्द्रस्य वचसा हत.
अविं वृक इव मथ्नीत स वो जीवन् मा मोचि प्राणमस्यापि नह्यत.. (४)
हे मनुष्यो! तुम इंद्र के वचनों से वृद्धि प्राप्त करो और शत्रुओं का विनाश करो. तुम शत्रु
को इस प्रकार मथो, जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को मथता है. वह जीवित न रहने पाए. तुम उसे
नष्ट कर दो. (४)
यममी पुरोदधिरे ब्रह्माणमपभूतये. इन्द्र स ते अधस्पदं तं प्रत्यस्यामि
मृत्यवे.. (५)
हे इंद्र! इन शत्रुओं ने हमारी दुर्गति के निमित्त यज्ञ में जिसे अपना पुरोहित बनाया है,
उस का अधःपतन हो जाए. मैं उसे मृत्यु के समीप फेंक रहा हूं. (५)