अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवह ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ विस्तृत होने के कारण यज्ञों में सब से अधिक वहन करने वाला
है. यजमान इस विस्तीर्ण अवयवों वाले ओदन को पका कर स्वर्ग प्राप्त करता है, अंडे की
आकृति वाले कंद से उत्पन्न कुमुद फूल को हृदय पर रखता है तथा कमल तंतुओं को, उत्पल
(कमल) के कंद को एवं जल में उत्पन्न तथा खुर की आकृति वाली मृणाली अर्थात् कमलिनी
को सीने पर रखता है. हे यजमान! स्वर्ग में तेरे समीप चारों ओर कमल के सरोवर स्थित रहें.
ये सभी धाराएं ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में मधुरता पूर्ण सिंचन करती
हुई तेरे समीप पहुंचें तथा समीप में वर्तमान सरोवर भी तेरे समीप उपस्थित हों. (५)
घृतहदा मधुकूलाः सुरोदकाः क्षीरेण पूर्णा उदकेन दध्ना.
एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा
तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (६)
हे यजमान! स्वर्गलोक में घी से भरे हुए गड्ढों वाली, शहद के किनारों वाली, मदिरा
रूपी जल वाली तथा दूध, दही एवं जल से पूर्ण सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें. ब्रह्मौदन सत्र
यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में मधुरता पूर्ण सिंचन करती हुई ये सभी धाराएं तेरे समीप
पहुंचें तथा समीप में वर्तमान सरोवर भी उपस्थित हों. (६)
चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि क्षीरेण पूर्णाँ उदकेन दध्ना.
एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा
तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (७)
मैं दूध, दही, शहद और मदिरा से भरे हुए चार घड़ों को पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर
दिशाओं में रखता हूं. हे यजमान! ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में दूध, जल
एवं दही से पूर्ण ये सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें एवं माधुर्य का सिंचन करते हुए सरोवर तेरे
समीप उपस्थित रहें. (७)
इममोदनं नि दधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम्.
स मे मा क्षैष्ट स्वधया पिन्वमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघा मे अस्तु.. (८)
इस विस्तृत अवयवों वाले, कर्म फल को जीतने वाले एवं स्वर्ग के साधन ओदन को मैं
ब्राह्मणों में रखता हूं. क्षीर आदि रस से बढ़ता हुआ यह नष्ट न हो. इस के फल के रूप में मुझे
भांतिभांति के फल देने वाली एवं कामनाएं पूर्ण करने वाली धेनु प्राप्त हो. (८)
सूक्त-३५ देवता—अतिमृत्यु
यमोदनं प्रथमजा ऋतस्य प्रजापतिस्तपसा ब्रह्मणेऽपचत्.
यो लोकानां विधृतिर्नाभिरेषात् तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (१)
परब्रह्म से प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भ नामक प्रजापति ने तप के द्वारा ब्रह्म के लिए जो
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