अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-३३ देवता—अग्नि
अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्. अप नः शोशुचदघम्.. (१)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से हमारा पाप नष्ट हो जाए. तुम हमारे धन को सभी ओर से
समृद्ध करो और हमारे पाप को नष्ट करो. (१)
सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यजामहे. अप नः शोशुचदघम्.. (२)
हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र एवं शोभन मार्ग पाने की इच्छा से तुम्हारा हवन करते हैं. तुम
हमारे धन को सभी ओर समृद्ध करो तथा हमारे पाप को नष्ट करो. (२)
प्र यद् भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरयः. अप नः शोशुचदघम्.. (३)
हे अग्नि! मैं उन स्तोताओं के मध्य श्रेष्ठ स्तोता हूं और मेरे ज्ञानी पुत्र आदि भी स्तोताओं
में श्रेष्ठ हैं, इसलिए तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (३)
प्र यत् ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम्. अप नः शोशुचदघम्.. (४)
हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता जो तुम्हारी कृपा से जन्म लेते हैं. इसलिए हम विद्वान् भी
तुम्हारी स्तुति के कारण पुत्र, पौत्र आदि से समृद्ध हों. तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (४)
प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानवः. अप नः शोशुचदघम्.. (५)
बलवान अग्नि की किरणें सभी ओर प्रवर्तित होती हैं, इसलिए तुम हमारे पापों को नष्ट
करो. (५)
त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि. अप नः शोशुचदघम्.. (६)
हे अग्नि! तुम सभी ओर मुख वाले एवं सर्वव्यापक हो. तुम हमारे पाप नष्ट करो. (६)
द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेव पारय. अप नः शोशुचदघम्.. (७)
हे सभी ओर मुख वाले अग्नि! जिस प्रकार लोग नाव के द्वारा उस पार पहुंच जाते हैं,
उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो तथा हमारे पापों को नष्ट करो. (७)
स नः सिन्धुमिव नावाति पर्षा स्वस्तये. अप नः शोशुचदघम्.. (८)
हे उक्त गुणों वाले अग्नि! जिस प्रकार नाव के द्वारा सागर को पार करते हैं, उसी प्रकार
हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो एवं हमारे पापों को नष्ट करो. (८)
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