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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 172 of 1063

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Page 172

तेन देवा देवतामग्र आयन् तेन रोहान् रुरुहुर्मेध्यासः. (१)
बकरा अग्नि के ताप से उत्पन्न हुआ था. उस ने सभी पशुओं की सृष्टि करने वाले
प्रजापति को सब से पहले देखा. सृष्टि के आदि में इंद्र आदि देव उसी बकरे के कारण देवत्व
को प्राप्त हुए. उसी बकरे को साधन बना कर अन्य ऋषि भी स्वर्ग आदि लोकों में पहुंचे. (१)
क्रमध्वमग्निना नाकमुख्यान् हस्तेषु बिभ्रतः.
दिवस्पृष्ठं स्वर्गत्वा मिश्रा देवेभिराध्वम्.. (२)
हे मनुष्यो! तुम यज्ञ के निमित्त प्रज्वलित अग्नि के द्वारा दुःख रहित स्वर्ग में पहुंचो.
अंतरिक्ष की पीठ के समान स्वर्ग में पहुंच कर तुम देवों के समान ऐश्वर्य प्राप्त करो तथा वहीं
निवास करो. (२)
पृष्ठात् पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद् दिवमारुहम्.
दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्व १ ज्योतिरगामहम्.. (३)
मैं पृथ्वि की पीठ अर्थात् भूलोक से अंतरिक्षलोक पर और अंतरिक्ष से स्वर्गलोक पर
चढ़ता हूं. दुःख रहित स्वर्ग की पीठ से मैं सूर्यमंडल में स्थित हिरण्यगर्भ रूपी ज्योति को प्राप्त
करता हूं. (३)
स्व १ र्यन्तो नापेक्षन्त आ द्यां रोहन्ति रोदसी.
यज्ञं ये विश्वतोधारं सुविद्वांसो वितेनिरे.. (४)
यज्ञ के फल से प्राप्त होने वाले स्वर्ग को जाने वाले लोग पुत्र, पशु आदि संबंधी सुख की
इच्छा नहीं करते हैं. जो यजमान विश्व को धारण करने वाले यज्ञ को भलीभांति जानते हुए
उस का विस्तार करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं. (४)
अग्ने प्रेहि प्रथमो देवतानां चक्षुर्देवानामुत मानुषाणाम्.
इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषाः स्वर्येन्तु यजमानाः स्वस्ति.. (५)
हे अग्नि देव! तुम देवों में मुख्य होने के कारण यज्ञ करने योग्य स्थान पर पहुंचो. अग्नि
देव हवि पहुंचाने के कारण इंद्र आदि देवों को नेत्र के समान प्रिय हैं तथा मनुष्यों को यज्ञ के
द्वारा पुण्यलोक का दर्शन कराते हैं. अग्नि के प्रकाश में यज्ञ करने के इच्छुक एवं यज्ञ करने
वाले भृगुवंशी महर्षियों के साथ समान प्रीति वाले बन कर यज्ञ के फल के रूप में स्वर्ग प्राप्त
करें. (५)
अजमनज्मि पयसा घृतेन दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तम्.
तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमृत्तमम्.. (६)
द्युलोक के योग्य एवं यजमान को स्वर्ग में पहुंचाने वाले बकरे को मैं रसयुक्त घी से
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