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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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हे जुती हुई भूमि! हम तुझे नमस्कार करते हैं. हे सुंदर भाग्य वाली भूमि! तू हमारे
अनुकूल बन. तू जिस प्रकार से हमारे अनुकूल मन वाली हो, उसी प्रकार हमें शोभन फल देने
वाली हो जा. (८)
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः.
सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत् पिन्वमाना.. (९)
हे जुती हुई भूमि! तू मधुर स्वाद वाले जल से भली प्रकार सिंची हुई हो कर तथा विश्वे
देव और मरुतों द्वारा अनुमति पा कर जल सहित हमारे सामने आ. तू शक्ति संपन्न हो कर घी
से मिले हुए अन्न को सींचने वाली है. (९)
सूक्त-१८ देवता—वनस्पति
इमां खनाम्योषधिं वीरुधां बलवत्तमाम्.
यया सपत्नीं बाधते यया संविन्दते पतिम्.. (१)
पाठा नाम की इस लता रूपी जड़ीबूटी को मैं खोदता हूं जो सभी जड़ीबूटियों से
अधिक बलवान है. इस जड़ीबूटी के द्वारा सौत को बाधा पहुंचती है तथा इसे धारण करने
वाली स्त्री पति को प्राप्त करती है. (१)
उत्तानपर्णे सुभगे देवजूते सहस्वति.
सपत्नीं मे परा णुद पतिं मे केवलं कृधि.. (२)
हे ऊपर की ओर मुख वाले पत्तों से युक्त जड़ीबूटी पाठा! तू इंद्र आदि देवों की कृपा से
मुझे प्राप्त हुई है. तू मेरी सौत को पराजित करने वाली है. तू मेरी सौत को मेरे पति से दूर ले
जा और मेरे पति को केवल मेरा बना. (२)
नहि ते नाम जग्राह नो अस्मिन् रमसे पतौ.
परामेव परावतं सपत्नीं गमयामसि.. (३)
हे सौत! मैं तेरा नाम कभी नहीं लेना चाहती. मेरे पति के साथ तू रमण मत कर. मैं तुझे
बहुत दूर भेज रही हूं. (३)
उत्तराहमुत्तर उत्तरेदुत्तराभ्यः. अधः सपत्नी या ममाधरा साधराभ्यः.. (४)
हे सभी जड़ीबूटियों में श्रेष्ठ पाठा! मैं अधिक श्रेष्ठ बनूं. लोक में जो अधिक श्रेष्ठ स्त्रियां
हैं, मैं उन से भी अधिक श्रेष्ठ बनूं. मेरी जो सौत है, वह अति नीच नारियों से भी नीच बने. (४)
अहमस्मि सहमानाथो त्वमसि सासहिः.
उभे सहस्वती भूत्वा सपत्नीं मे सहावहै.. (५)
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