अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextऋतेन स्थूणामधि रोह वंशोग्रो विराजन्नप वृङ्क्ष्व शत्रून्.
मा ते रिषन्नुपसत्तारो गृहाणां शाले शतं जीवेम शरदः सर्ववीराः.. (६)
हे बांस! तू बाधाहीन रूप से इस शाला के खंभे के रूप में खड़ा रह तथा शक्तिशाली
बन कर विराजता हुआ हमारे शत्रुओं को यहां से दूर भगा. हे शाला! तेरे आवासों में निवास
करने वालों की हिंसा न हो. हम अभिलषित पुत्रों और पौत्रों से युक्त हो कर सौ वर्ष तक
जीवित रहें. (६)
एमां कुमारस्तरुण आ वत्सो जगता सह.
एमां परिस्रुतः कुम्भ आ दध्नः कलशैरगुः.. (७)
युवक पुत्र और गायों के सहित बछड़े इस शाला में आएं. टपकने वाले शहद तथा दही
के कलश भी इस शाला में आएं. (७)
पूर्ण नारि प्र भर कुम्भमेतं घृतस्य धाराममृतेन संभृताम्.
इमां पातॄनमृतेना समङ्ग्धीष्टापूर्तमभि रक्षात्येनाम्.. (८)
हे स्त्री! तू अमृत के समान जल से युक्त शहद, घी आदि की धारा बहाती हुई जल से
भरे घड़े को ले कर इस शाला में आ तथा इस घट को अमृत के समान जल से पूर्ण कर. इस
शाला में किए जाने वाले श्रौत और स्मार्त कर्म चोरों, अग्नि आदि से हमारी रक्षा करें. (८)
इमा आपः प्र भराम्ययक्ष्मा यक्ष्मनाशनीः.
गृहानुप प्र सीदाम्यमृतेन सहाग्निना.. (९)
मैं यक्ष्मा रोग से रहित और अपने सेवकों के यक्ष्मा रोग का विनाश करने वाले जलों से
पूर्ण कलश को शाला में लाता हूं. इस के साथ ही मैं कभी न बुझने वाली अग्नि को भी लाता
हूं. (९)
सूक्त-१३ देवता—सिंधु, जल, वरुण
यददः संप्रयतीरहावनदता हते.
तस्मादा नद्यो ३ नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः.. (१)
हे जल! मेघों के द्वारा ताड़ित हो कर इधरउधर गमन करने और नाद करने के कारण
तुम्हारा नाम नदी हुआ है. हे बहने वाले जल! तुम्हारे उदक आदि अन्य नाम भी इसी प्रकार
सार्थक हैं. (१)
यत् प्रेषिता वरुणेनाच्छीभं समवल्गत.
तदाप्रोदिन्द्रो वो यतीस्तस्मादापो अनु ष्ठन.. (२)
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