अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदर्प से अन्य पशुओं को पराजित करता है. हे पीपल! तुम से निर्मित मणि को धारण करने
वाले हम शत्रुओं का नाश करें. (४)
सिनात्वेनान् निर्ऋतिर्मृत्योः पाशैरमोक्यैः.
अश्वत्थ शत्रून् मामकान् यानहं द्वेष्मि ये च माम्.. (५)
हे अश्वत्थ! पाप की देवी मृत्यु के न छूटने वाले फंदों से मेरे उन शत्रुओं को बांधो, जिन
से मैं द्वेष करता हूं और जो मुझ से द्वेष करते हैं. (५)
यथाश्वत्थ वानस्पत्यानारोहन् कृणुषे ऽ धरान्.
एवा मे शत्रोर्मूर्धानं विष्वग् भिन्द्धि सहस्व च.. (६)
हे अश्वत्थ! जिस प्रकार तुम सभी वनस्पतियों अर्थात् वृक्षों को नीचे छोड़ते हुए ऊपर
उठते हो, उसी प्रकार मेरे शत्रुओं के शीशों को सभी और से कुचलो और उन का विनाश कर
दो. (६)
ते ऽ धराञ्चः प्र प्लवन्तां छिन्ना नौरिव बन्धनात्.
न वैबाधप्रणुत्तानां पुनरस्ति निवर्तनम्.. (७)
तट के वृक्षों से रस्सी के सहारे बंधी हुई नाव खुलने के बाद जिस प्रकार किनारे को
प्राप्त न कर के नदी की धारा के साथ नीचे की ओर बहती जाती है, उसी प्रकार मेरे शत्रु नीचे
को मुंह कर के नदी के प्रवाह में बहें, क्योंकि खदिर के वृक्ष में उत्पन्न पीपल के प्रभाव में आए
हुए शत्रुओं का उद्धार नहीं होता. (७)
प्रैणान् नुदे मनसा प्र चित्तेनोत ब्रह्मणा.
प्रैणान् वृक्षस्य शाखयाश्वत्थस्य नुदामहे.. (८)
मैं दृढ़ मानसिक शक्ति और गंध के प्रभाव द्वारा अपने शत्रुओं का उच्चाटन करता हूं. मैं
मंत्रों से प्रभावित पीपल वृक्ष की शाखा के द्वारा शत्रुओं का विनाश करता हूं. (८)
सूक्त-७ देवता—हरिण आदि
हरिणस्य रघुष्यदो ऽ धि शीर्षणि भेषजम्.
स क्षेत्रियं विषाणया विषूचीनमनीनशत्.. (१)
तेज दौड़ने वाले काले हरिण के सिर में जो सींग रूपी रोग निवारक ओषधि है, वह
मातापिता से आए हुए क्षय, कुष्ठ, मिरगी आदि का पूर्णतया नाश करे. (१)
अनु त्वा हरिणो वृषा पद्भिश्चतुर्भिरक्रमीत्.
विषाणे वि ष्य गुष्पितं यदस्य क्षेत्रियं हृदि.. (२)
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