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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 1060 of 1063

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Page 1060

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण दिया गया है:

यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि.
यद् वा वाणीभिरविनेवेत् काण्वस्य बोधतम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम उक्थों अर्थात् मंत्र समूहों के द्वारा तुम्हारा आश्रय लेते हैं. यह
कण्व ऋषि की कृपा है कि हम वाणी के द्वारा तुम्हारी सेवा कर रहे हैं. (४)
यद् वां कक्षीवाँ उत यद् व्यश्व ऋषीर्यद् वां दीर्घतमा जुहाव.
पृथी यद् वां वैन्यः सादनेष्वेवेदतो अश्विना चेतयेथाम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! कक्षीवान, दीर्घतमा और व्यश्व ऋषियों ने तुम्हें आहुति दी है. वेन का
पुत्र पृथु तुम्हारे सब सदनों में है. इसलिए तुम चैतन्य हो जाओ. (५)
सूक्त-१४१ देवता—इंद्र
यातं छर्दिष्पा उत नः परस्पा भूतं जगत्या उत नस्तनूपा.
वर्तिस्तोकाय तनयाय यातं.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे रक्षक के रूप में आओ. तुम हमारे घर की रक्षा करते हुए
हमें मिलो. तुम हमारे पुत्र, पौत्र आदि के रूप में हमें प्राप्त होओ तथा संसार की रक्षा करने
वाले हो कर हम से मिलो. (१)
यदिन्द्रेण सरथं याथो अश्विना यद् वा वायुना भवथः समोकसा.
यदादित्येभिर्ऋभुभिः सजोषसा यद् वा विष्णोर्विक्रमणेषु तिष्ठथः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इंद्र के रथ में उन के साथ बैठ कर चलते हो. तुम वायु के साथ
चलने वाले, आदित्य और ऋभुओं, स्नेही तथा विष्णु के विक्रमणों अर्थात् डगों से भी युक्त
हो. (२)
यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये.
यत् पृत्सु तुर्वणे सहस्तच्छ्रेष्ठमश्विनोरवः.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमानों को शीघ्रता से प्राप्त होते ही युद्ध में अपनी उत्तम रक्षण
शक्ति से शत्रु का वध करते हो. मैं तुम्हें अन्न प्राप्त करने के लिए बुलाता हूं. (३)
आ नूनं यात्माश्विनेमा हव्यानि वां हिता.
इमे सोमासो अधि तुर्वशे यदाविमे कण्वेषु वामथ.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! यह हव्य तुम्हारे लिए हितकारी है. यह सोमरस तुवर्श, यदु तथा कण्व
ऋषि का है. तुम यहां अवश्य आगमन करो. (४)