अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextद्वौ वा ये शिशवः.. (१५)
दो बालक हैं. (१५)
नीलशिखण्डवाहनः.. (१६)
नीलशिखंड उन का वाहन है. (१६)
सूक्त-१३३
विततौ किरणौ द्वौ तावा पिनष्टि पूरुषः.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (१)
हे कुमारी! तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. दो किरणें फैली हुई हैं. पुरुष उन्हें
पीसने वाला है. (१)
मातुष्टे किरणौ द्वौ निवृत्तः पुरुषानृते.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (२)
हे पुरुष! तू जिस असत्य से मुक्त हुआ है, वह तेरी माता की दो किरणें हैं. हे कुमारी!
उसे तू जैसा समझती है, वह उस तरह का नहीं है. (२)
निगृह्य कर्णकौ द्वौ निरायच्छसि मध्यमे.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (३)
हे मध्यमा! तू दोनों कानों को पकड़ कर उसे नियुक्त करती है. तू उसे जैसा समझती है,
वह उस प्रकार का नहीं है. (३)
उत्तानायै शयानायै तिष्ठन्ती वाव गूहसि.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (४)
हे कुमारी! तू सोने जाती है. तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. (४)
श्लक्ष्णायाँ श्लक्षिणकायां श्लक्ष्णमेवाव गूहसि.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (५)
हे कुमारी! तु आलिंगन में अपना शरीर छिपाती है. तू उसे जैसा समझती है वह उस
तरह का नहीं है. (५)
अवश्लक्ष्णमिव भ्रंशदन्तर्लोममति हृदे.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (६)
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