अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूर्य चामू रिशादसस्तद् देवाः प्रागकल्पयन्.. (१)
अभिषव अर्थात् सोमरस निचोड़ने का काम करने वाला, यज्ञकर्ता एवं सभ्य पुरुष
सूर्यलोक को भेद कर उस से ऊपर वाले लोक में जाता है. इस की कल्पना देवताओं ने पहले
कर ली थी. (१)
यो जाम्या अप्रथयस्तद् यत् सखायं दुधूर्षति.
ज्येष्ठो यदप्रचेतास्तदाहुरधरागिति.. (२)
जाम्य ने जिसे विस्तृत किया, वह मित्र को सुशोभित करता है. जो ज्येष्ठ प्रचेता है, उसे
लोग अधराक् कहते हैं. (२)
यद् भद्रस्य पुरुषस्य पुत्रो भवति दाधृषिः.
तद् विप्रो अब्रवीदु तद् गन्धर्वः काम्यं वचः.. (३)
जिस ब्राह्मण का पुत्र धारण करने वाला होता है. वह ब्राह्मण अभीष्ट वचन करने में
समर्थ है. ऐसा गंधर्व कहते हैं. (३)
यश्च पणि रघुरिजिष्ठ्यो यश्च देवां अदाशुरिः.
धीराणां शश्वतामहं तदपागिति शुश्रुम.. (४)
जो वणिक् देवताओं को हवि दान नहीं करता, वह शाश्वत वीरों का सेवक बनता है.
ऐसा सुना जाता है. (४)
ये च देवा अयजन्ताथो ये च पराददिः.
सूर्यो दिवमिव गत्वाय मघवा नो वि रप्शते.. (५)
जो स्तोता एवं परा गौ का दान करने वाले हैं, वे सूर्य के समान स्वर्ग में जाते हैं. (५)
योनाक्ताक्षो अनभ्यक्तो अमणि वो अहिरण्यरः.
अब्रह्मा ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता.. (६)
जो भक्त नहीं है, जो आक्त अदक्ष नहीं है, जो मणिवान नहीं, जो हिरपाप नहीं है तथा
जो ब्राह्मण नहीं है; वह ब्रह्म पुत्र स्तोता कल्पों में मान्य है. (६)
य आक्ताक्षः सुभ्यक्तः सुमणिः सुहिरण्यवः.
सुब्रह्म ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता.. (७)
जो आक्त अक्ष हैं, जो सुभक्त हैं, जो सुंदर मणि वाले हैं; ऐसे ब्रह्म पुत्र स्तोता हैं, यह
कल्पों अर्थात् कला ग्रंथों में माना गया है. (७)
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