अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउष्ट्रा यस्य प्रवाहणो वधूमन्तो द्विर्दश.
वर्ष्मा रथस्य नि जिहीडते दिव ईषमाणा उपस्पृशः.. (२)
जिस वधू वाले रथ को बारह ऊंट खींचने वाले हैं, वह आकाश का स्पर्श करता हुआ
चलता है. (२)
एष इषाय मामहे शतं निष्कान् दश स्रजः.
त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्.. (३)
अन्न प्राप्ति के निमित्त मैं निष्क नाम की सौ स्वर्ण मुद्राएं, तीन सौ घोड़े, दस हजार गाएं
और दस मालाएं देता हूं. (३)
वच्यस्व रेभ वच्यस्व वृक्षे न पक्वे शकुनः.
नष्टे जिह्वा चर्चरीति क्षुरो न भुरिजोरिव.. (४)
हे स्तुतिकर्ताओं! पके हुए फलों वाले वृक्ष पर बैठा हुआ पक्षी जिस प्रकार का मधुर
शब्द करता है, तुम भी उसी प्रकार का शब्द करो. जिस प्रकार हाथ में पकड़ा हुआ छुरा नहीं
रुकता, उसी प्रकार तुम्हारी जीभ भी न रुके अर्थात् तुम उच्चारण करते रहो. (४)
प्र रेभासो मनीषा वृषा गाव इवेरते.
अमोतपुत्रका एषाममोत गा इवासते.. (५)
यह मनीषी स्तोता यहां शक्तिशाली वृषभों अर्थात् बैलों के समान वर्तमान है. इन के घर
में पुत्र, गाएं आदि हैं. (५)
प्र रेभ धीं भरस्व गोविदं वसुविदम्.
देवत्रेमां वाचं शृणीहीषुर्नावीरस्तारम्.. (६)
हे स्तोता! बाण जिस प्रकार मनुष्य की रक्षा करता है, उसी प्रकार वाणी तेरी रक्षा करे.
तू गौ तथा धन प्राप्त कराने वाली बुद्धि को प्राप्त करे. (६)
राज्ञो विश्वजनीनस्य यो देवो ऽ मर्त्याँ अति.
वैश्वानरस्य सुष्टुतिमा सुनोता परिक्षितः.. (७)
यदि देवता प्रजा के मनुष्यों का अतिक्रमण करे तो वैश्वानर की मंगलमयी स्तुति करनी
चाहिए. (७)
परिच्छिन्नः क्षेममकरोत् तम् आसनमाचरन्.
कुलायन् कृण्वन् कौरव्यः पतिर्वदति जायया.. (८)
मंगल करने वाला देवता आसन का विस्तार करता है. कौरव्य पति इस प्रकार की शिक्षा
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