Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 1037 of 1063

Read in context
Page 1037

हे इंद्राणी! मैं अपने मित्र वृषाकपि के अतिरिक्त अन्य किसी के पास नहीं जाता हूं. इन
की हवि का संस्कार जल से किया जाता है. ये मुझे सभी देवों की अपेक्षा अधिक प्रिय हैं. ये
इंद्र सभी देवों में उत्कृष्ट हैं. (१२)
वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे.
घसत् त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१३)
हे वृषाकपि रूप सूर्य की पत्नी! तू सुपुत्रों वाली एवं धन से संपन्न है. तेरी जल रूपी
हवि का इंद्र सेवन करें, क्योंकि वे सभी देवों में श्रेष्ठ हैं. (१३)
उक्षणो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम्.
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१४)
मुझ महान के पंद्रह सेवक बीस प्रकार की हवि का पाक करते हैं. मैं उन हवियों का
सेवन करता हूं. इस प्रकार मेरी दोनों कोखें भरी हुई हैं. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१४)
वृषभो न तिग्मशृङ्गो ऽ नर्त्यूथेषु रोरुवत्.
मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१५)
हे इंद्र! जिस प्रकार सींगों वाले बैल गायों में शब्द करते हैं, उसी प्रकार जिन के हृदय
को तुम्हारा मंथन सुख देता है, वही सुख प्राप्त करता है, क्योंकि इंद्र सर्वोत्कृष्ट हैं. (१५)
न सेशे यस्य रम्बते ऽ न्तरा सक्थ्या ३ कपृत्.
सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१६)
जंघाओं में आभूषण लटकाने वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं करता. जिस बैठने की इच्छा वाले
के रोम अंगड़ाई लेते हैं, वह सामर्थ्य वाला होता है. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१६)
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते.
सेदीशे यस्य रम्बते ऽ न्तरा सक्थ्या ३ कपृद् विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१७)
जिस का रोमों वाला मेढ़ा जमुहाई लेता है, वह असमर्थ होता है. जिस का पुरुष अंग
जांघों में लटकता है वह सामर्थ्य वाला होता है. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१७)
अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्.
असिं सूनां नवं चरुमाधेष्स्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१८)
हे इंद्र! वृषाकपि ने अपने समीप नष्ट हुए शत्रु के धन को प्राप्त किया. इस के अतिरिक्त
असि, सूना तथा नवीन चरु को ग्रहण किया. वे इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१८)
अयमेमि विचाकशद् विचिन्वन् दासमार्यम्.
ebook converter DEMO Watermarks*