अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextकरते हो. (२)
सूक्त-११४ देवता—इंद्र
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि. युधेदापित्वमिच्छसे..
(१)
हे इंद्र! तुम प्रकट होते ही मिलने की कामना करते हो तथा युद्ध में विजय की इच्छा
करते हो. तुम्हारा कोई भी शत्रु शेष नहीं है. (१)
नकी रेवन्तं सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः.
यदा कृणोषि नदनं समूहस्यादित् पितेव हूयसे.. (२)
हे इंद्र! सुराश्व अर्थात् मदिरा पीने वाले तुम्हें दुःखी करते हैं. तुम जब गर्जन करने लगते
हो, तब पिता के समान कहे जाते हो. तुम धनी मनुष्य को मित्रता के लिए प्राप्त करते हो.
(२)
सूक्त-११५ देवता—इंद्र
अहमिद्धि पितुषपरि मेधामृतस्य जग्रभ. अहं सूर्य इवाजनि.. (१)
मैं सूर्य के समान उत्पन्न हुआ हूं. मैं ने अपने पिता ब्रह्मा की बुद्धि प्राप्त की है. (१)
अहं प्रत्नेन मन्मना गिरः शुम्भामि कण्ववत्. येनेन्द्रः शुष्ममिद् दधे.. (२)
मैं प्राचीन स्तोत्र के द्वारा अपनी वाणियों को सुसज्जित करता हुआ इंद्र को शक्तिशाली
बनाता हूं. (२)
ये त्वामिन्द्र न तुष्टुवुर्ऋषयो ये च तुष्टुवुः. ममेद् वर्धस्व सुष्टुतः.. (३)
हे इंद्र! जिन ऋषियों ने तुम्हारी स्तुति नहीं की है, उन से उदासीन रहते हुए तुम मेरी
स्तुति से ही वृद्धि प्राप्त करो. (३)
सूक्त-११६ देवता—इंद्र
मा भूम निष्ट्या इवेन्द्र त्वदरणा इव.
वनानि न प्रजहितान्यद्रिवो दुरोषासो अमन्महि.. (१)
हे इंद्र! हम तुम्हारा ऋण नहीं चुका सके हैं, इस कारण तुम हमें दुष्ट शत्रु के समान मत
मानना. तुम्हारे द्वारा त्याज्य वस्तुओं को हम भी दावानल के समान त्याज्य समझें. (१)
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