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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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प्रकट करते हैं तथा सभी अंधकारों और पापों से पार हो जाते हैं. (१३)
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्राद् द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (१४)
किरणों का पूजनीय समूह मित्र, वरुण तथा अग्नि के चक्षु के रूप में उदय हो रहा है. ये
सूर्य ही प्राणियों की आत्मा तथा अपनी महिमा से आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष को पूर्ण
करते हैं. (१४)
सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्.
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम्.. (१५)
जिस प्रकार पुरुष नारी के पीछे जाता है. उसी प्रकार सूर्य उषा देवी के पीछे गमन करते
हैं. उस समय भले लोग अपना समय देव कार्य में लगाते हुए सूर्य के निमित्त श्रेष्ठ कर्म करते
हैं. (१५)
सूक्त-१०८ देवता—इंद्र
त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे. आ वीरं पृतनाषहम्.. (१)
हे सैकड़ों कर्म करने वाले इंद्र! तुम हमें धन, बल तथा ऐसी संतान दो, जो हमारे शत्रुओं
को हरा सके. (१)
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ. अधा ते सुम्नमीमहे..
(२)
हे इंद्र! तुम हमारे पिता और माता हो. इसी कारण हम तुम से सुख की याचना करते हैं.
(२)
त्वां शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो. स नो रास्व सुवीर्यम्.. (३)
हे इंद्र! तुम हवि रूपी अन्न की कामना करते हो. मैं तुम्हारी बारबार स्तुति करता हूं. तुम
मुझे वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (३)
सूक्त-१०९ देवता—इंद्र
स्वादोरित्था विषूवतो मध्वः पिबन्ति गौर्यः.
या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्‍यम्.. (१)
स्तोत्ररूपी वाणियां विषूवत नाम के यज्ञ के स्वादिष्ट मधु का इस प्रकार पान करती हैं,
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