अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतुम्हें हर्ष प्रदान करता है. (३)
सूक्त-१०७ देवता—इंद्र और सूर्य
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः. समुद्रायेव सिन्धवः.. (१)
कर्म करने वाले इंद्र के लिए सभी प्रजाएं उसी प्रकार झुकती हैं, जिस प्रकार समुद्र के
लिए सभी नदियां झुक कर चलती हैं. (१)
ओजस्तदस्य तितिविष उभे यत् समवर्तयत्. इन्द्रश्चर्मेव रोदसी.. (२)
इंद्र ने आकाश और पृथ्वी को चर्म के समान लपेट लिया था. यह इंद्र का महान पराक्रम
है. (२)
वि चिद् वृत्रस्य दोधतो वज्रेण शतपर्वणा. शिरो बिभेद वृष्णिना.. (३)
इंद्र ने क्रोध में भरे हुए वृत्र के शीश को अपने सौ धारों वाले एवं रक्त वर्षक वज्र के द्वारा
काट दिया था. (३)
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेषनृम्णः.
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यदेनं मदन्ति विश्व ऊमाः.. (४)
ये इंद्र शक्तिशाली, धन संपन्न तथा सभी लोकों में श्रेष्ठ हैं. ये उत्पन्न होते ही शत्रु का वध
करते हैं. इन के प्रकट होते ही इन की रक्षक शक्तियां शक्तिशालिनी बन जाती हैं. (४)
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दसाय भियसं दधाति.
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (५)
स्थावर और जंगम जगत् ब्रह्म में लीन हो जाता है. शक्तिशाली शत्रु दासों को त्रास देता
है. वेतन पाने वाले सैनिक युद्धों में इंद्र की ही प्रार्थना करते हैं. (५)
त्वे क्रतुमपि पृञ्चन्ति भूरि द्विर्यदेते त्रिर्भवन्त्यूमाः.
स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि ऽ योधीः.. (६)
ये वीर जन्म के संस्कार तथा युद्ध की दीक्षा लेने के कारण त्रिजन्म अर्थात् तीन बार
जन्म लेने वाले कहलाते हैं. इन वीरों को स्वादिष्ट पदार्थों वाला बनाओ. हे इंद्र! तुम इन वीरों
में प्रवेश कर के संग्राम में तत्पर बनो. (६)
यदि चिन्नु त्वा धना जयन्तं रणेरणे अनुमदन्ति विप्राः.
ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोकाः.. (७)
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