अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहमारे इस यज्ञ में ले कर आओ. (३)
सूक्त-१०२ देवता—अग्नि
ईळेन्यो नमस्य स्तिरस्तमांसि दर्शतः. समग्निरिध्यते वृषा.. (१)
अग्नि स्तुतियों और नमस्कारों के योग्य हैं. कामनाओं की वर्षा करने वाले एवं दर्शनीय
हैं. अग्नि अपने धूम को तिरछा करते हुए प्रज्वलित होते हैं. (१)
वृषो अग्निः समिध्यते ऽ श्वो न देववाहनः. तं हविष्मन्त ईळते.. (२)
कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि देवताओं को वहन करने वाले अश्व के समान
प्रदीप्त होते हैं. हवि देने वाले यजमान उन प्रदीप्त अग्नि की पूजा करते हैं. (२)
वृषणं त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि. अग्ने दीद्यतं बृहत्.. (३)
हे कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि! हवि की वर्षा करने वाले हम कामनाओं की
वर्षा करने वाले तुम को भलीभांति प्रज्वलित करते हैं. इसलिए तुम भलीभांति प्रदीप्त बनो.
(३)
सूक्त-१०३ देवता—अग्नि
अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्.
अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरो ऽ ग्निं सुदीतये छर्दिः.. (१)
हे मनुष्य! तू अन्न प्राप्ति के लिए अग्नि की गाथाओं के द्वारा अग्नि की स्तुति कर. तू
ऐसे अग्नि की पूजा कर जो धन दान के लिए प्रसिद्ध, प्रदीप्त और शोभायमान हैं. (१)
अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे.
आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे.. (२)
हे अग्नि! हम श्रोतागण तुम्हें यज्ञ में बुलाते हैं. तुम अपनी सभी शक्तियों के साथ इस
यज्ञ में आओ. भली प्रकार प्रस्तुत किए गए, हवि रूप से युक्त बर्हि तुम्हारे साथ सुसंगत बनें.
(२)
अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः सुचश्चरन्त्यध्वरे.
ऊर्जो नपातं घृतकेशमीमहे ऽ ग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (३)
हे अंगिरा गोत्र वाले अग्नि! तुम जल के पुत्र के समान हो. यज्ञ के सुच अर्थात् सुवा नाम
के पात्र तुम्हारे सामने गति करते हैं. हम यज्ञ में सदा नवीन और शक्तिशाली अग्नि की स्तुति
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