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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 1018 of 1063

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Page 1018

मैं तेरी अस्थियों से, नाड़ियों से, कंधों और भुजाओं में यक्ष्मा रोग को नष्ट करता हूं.
(१८)
हृदयात् ते परि क्लोम्नो हलीक्ष्णात् पार्श्वभ्याम्.
यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीह्नो यकन्स्ते वि वृहामसि.. (१९)
हे रोगी! मैं तेरे हृदय से यक्ष्मा रोग को निकालता हूं. हृदय के समीप स्थित कलोम से,
हलीक्ष्य से, पित्ताशय से, पार्श्वों से, प्लीहा अर्थात् तिल्ली से, यकृत से और तेरे उदर से भी तेरे
यक्ष्मा रोग को नष्ट करता हूं. (१९)
आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि.
यक्ष्मं कुक्षिभ्यां प्लाशोर्नाभ्या वि वृहामि ते.. (२०)
हे क्षय रोग से ग्रसित रोगी! मैं तेरी आंखों से, गुदा से, उदर से, दोनों कुक्षियों से, प्लाशी
से तथा नाभि से यक्ष्मा रोग को बाहर निकाल कर हटाता हूं. (२०)
ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पाष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्.
यक्ष्मं भसद्यं १ श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते.. (२१)
मैं तेरे उरुओं अर्थात् जंघाओं, घुटनों तथा पैरों के ऊपर तथा आगे के भाग से, कमर से,
कमर के नीचे से यक्ष्मा रोग को बाहर निकाल कर अलग करता हूं. (२१)
अस्थिभ्यस्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः.
यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते.. (२२)
मज्जा, अस्थि, सूक्ष्म नाड़ियों, उंगलियों, नाखूनों और तेरे शरीर की सभी धातुओं से तेरे
यक्ष्मा रोग को बाहर निकाल कर तुझ से दूर करता हूं. (२२)
अङ्गे अङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि.
यक्ष्मं त्वचस्यं ते वयं कश्यपस्य वीबर्हेण विष्वञ्चं वि वृहामसि.. (२३)
हे रोगी! तेरे सब अंगों, सभी रोम कूपों तथा जोड़ों में व्याप्त यक्ष्मा रोग को हम दूर
करते हैं. तेरी त्वचा में स्थित तथा नेत्रों में व्याप्त यक्ष्मा रोग को भी मैं मंत्रों द्वारा नष्ट करता हूं.
(२३)
अपेहि मनसस्पते ऽ प क्राम परश्चर.
परो निर्ऋत्या आ चक्ष्व बहुधा जीवतो मनः.. (२४)
हे रोग! तू मन पर भी अधिकार करने वाला है. तू दूर हो जा. इस जीवित पुरुष के मन
से दूर होने के लिए तू निर्ऋति से कह. (२४)
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