अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextत्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः. त्वं वृषन् वृषेदासि.. (५)
हे इंद्र! तुम कामनाओं की वर्षा करने वाले अपने उस ओज के साथ प्रकट हुए हो, जो सभी को पराजित करता है. (५)
त्वमिन्द्रासि वृत्रहा व्य १ न्तरिक्षमतिरः. उद् द्यामस्तभ्ना ओजसा.. (६)
हे इंद्र! तुम अंतरिक्ष को लांघने में समर्थ हो. वहां तुम वृत्र राक्षस का नाश करते हो. तुम्हारा ओज स्तंभित करने वाला है, जिस से द्युलोक स्थिर हुआ है. (६)
त्वमिन्द्र सजोषसमर्कं बिभर्षि बाह्वोः. वज्रं शिशान ओजसा.. (७)
हे इंद्र! तुम प्रीतकर मित्र सूर्य को धारण करने के पश्चात तीव्र वज्र को अपने ओज से धारण करते हो. (७)
त्वमिन्द्राभिभूरसि विश्वा जातान्योजसा. स विश्वा भुव आभवः.. (८)
हे इंद्र! तुम उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थों को अपने बल से अधीन कर लेते हो. तुम सभी शक्तियों को अपने वश में करो. (८)
सूक्त-९४ देवता—इंद्र
आ यात्विन्द्रः स्वपतिर्मदाय यो धर्मणा तूतुजानस्तुविष्मान्.
प्रतवक्षाणो अति विश्वा सहांस्यपारेण महता वृष्ण्येन.. (१)
जो इंद्र धर्म के ईश्वर एवं स्वभाव से शीघ्रता करने वाले हैं, वे हर्ष प्राप्त करने के लिए यहां आएं तथा अपनी शक्ति से हमारे उन शत्रुओं को सभी प्रकार क्षीण करें जो हमें दबाना चाहते हैं. (१)
सुष्ठामा रथः सुयमा हरी ते मिम्यक्ष वज्रो नृपते गभस्तौ.
शीभं राजन्त्सुपथा याह्यर्वाङ् वर्धाम ते पपुषो वृष्ण्यानि.. (२)
हे इंद्र! तुम अपने हाथ में वज्र धारण करते हो. तुम्हारे घोड़े सभी प्रकार से तुम्हारे अधीन रहते हैं. तुम्हारे रथ में बैठने का स्थान श्रेष्ठ है. तुम सुंदर मार्ग द्वारा स्वर्ग से आओ. हम सोमपान की कामना वाली तुम्हारी शक्ति को बढ़ाते हैं. (२)
एन्द्रवाहो नृपतिं वज्रबाहुमुग्रमुग्रासस्तविषाम एनम्.
प्रतवक्षसं वृषभं सत्यशुष्ममेमस्मत्रा सधमादो वहन्तु.. (३)
इंद्र वज्रधारी, राजा, भयंकर शत्रुओं का विनाश करने वाले, सत्य के कारण शक्तिशाली तथा कामनाओं की वर्षा करने वाले हैं. इंद्र के शक्तिशाली घोड़े उन्हें ले कर हमारे यज्ञ में
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