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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 1010

इंद्र श्रेष्ठ राजकुमार के समान अपने रथ पर बैठते हैं. वे अपने पिता द्यावा और माता
पृथ्‍वी के निमित्त खाने के लिए भोजन पकाते हैं. (१२)
आ तू सुशिप्र दंपते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्.
अध द्युक्षं सचेवहि सहस्रपादमरुषं स्वस्तिगामनेहसम्.. (१३)
हे इंद्र! तुम स्वर्ण से बने इस रथ पर बैठो. तुम्हारी कृपा से हम भी उस स्वर्ग पर चढ़ें, जो
सुंदर वाणियों से संपन्न एवं हजारों मार्गों वाला है. (१३)
तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते.
अर्थं चिदस्य सुधितं यदेतव आवर्तयन्ति दावने.. (१४)
उन इंद्र की इस प्रकार की महिमा जानने वाले व्यक्ति अपने राज्य में प्रतिष्ठित होते हैं.
ऋत्विक् समूह हवि देने वाले यजमान के लिए इंद्र के पास जो धन होता है, उसे प्राप्त कराते
हैं. (१४)
अनु प्रत्नस्यौकसः प्रियमेधास एषाम्.
पूर्वामनु प्रयतिं वृक्तबर्हिषो हितप्रयस आशत.. (१५)
प्रिय मेधा वाले ऋत्विज् इन इंद्र के पूर्व दिशा में बने भवन से हितकारी अन्न प्राप्त कर
के प्रगति करते हैं. (१५)
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः.
विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो वो वृत्रहा गृणे.. (१६)
ज्येष्ठ राजा इंद्र अपने रथ के द्वारा गमन करते हुए सभी सेनाओं के पार चले जाते हैं. मैं
उन की स्तुति करता हूं. (१६)
इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि.
हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (१७)
इंद्र की सत्ता मध्यलोक में, अंतरिक्ष में तथा स्वर्गलोक में भी हैं. क्रीड़ा के निमित्त ऊंचा
वज्र इंद्र के हाथ में है. वे सूर्य के समान दर्शन करने योग्य हैं. इस यज्ञ में अन्न प्राप्ति के लिए
उन्हीं इंद्र को आनंदित करो. (१७)
नकिष्टं कर्मणा नशद् यश्चकार सदावृधम्.
इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्णवो जसम्.. (१८)
जो पुरुष महान पराक्रमी, ऋभुओं का नाश करने वाले, धृष्ट न होने वाले, वृद्धिकर्ता
तथा धर्षक तेज से संपन्न इंद्र की उपासना में संलग्न होता है, उसे उस के कर्म से कोई रोक
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