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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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हमारे आशीर्वाद सत्य हों. हे द्यावा पृथ्वी! इसे अन्न दो तथा उत्तम संतान वाला बनाओ.
तुम दोनों एकमत हो कर इसे बल एवं धन प्रदान करो. हे इंद्र देव! यह पुरुष अपने बल से
शत्रुओं को विजय और खेतों को अपने अधिकार में करता हुआ अपने शत्रुओं को पराजित
करे. (३)
इन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टो मरुद्भिरुग्रः प्रहितो न आगन्.
एष वां द्यावापृथिवी उपस्थे मा क्षुधन्मा तृषत्.. (४)
इंद्र से जीवन प्राप्त कर के, वरुण की अनुमति ले कर तथा मरुतों से बल प्राप्त कर के
भेजा हुआ यह हमारे समीप आया है. हे द्यावा पृथ्वी! तुम्हारी गोद में वर्तमान यह पुरुष न
कभी भूखा रहे और न कभी प्यास से व्याकुल हो. (४)
ऊर्जमस्मा ऊर्जस्वती धत्तं पयो अस्मै पयस्वती धत्तम्.
ऊर्जमस्मै द्यावापृथिवी अधातां विश्वे देवा मरुत् ऊर्जमापः.. (५)
हे शक्तिशालिनी द्यावा पृथ्वी! इस भूखे को बलकारक अन्न दो. हे जलपूर्ण द्यावा पृथ्वी!
इस प्यासे की रोग निवृत्ति के लिए जल प्रदान करो. प्रार्थना करने पर द्यावा पृथ्वी इसे अन्न दें.
विश्वे देव, मरुदगण एवं जल देवता इसे बल प्रदान करें. (५)
शिवाभिष्ठे हृदयं तर्पायम्यनमीवो मोदिषीष्ठाः सुवर्चाः.
सवासिनौ पिबतां मन्थमेतमश्विनो रूपं परिधाय मायाम्.. (६)
हे प्यासे पुरुष! मैं तेरे नीरस हृदय को सुखकारी जलों से तृप्त करता हूं. इस के पश्चात
तू रोग रहित, उत्तम तेज युक्त एवं प्रसन्न हो जाएगा. एक मत धारण करने वाले अश्विनीकुमार
मायारूप बना कर इस सत्तू को पीने के लिए शक्ति तैयार करें. (६)
इन्द्र एतां ससृजे विद्धो अग्र ऊर्जां स्वधामजरां सा त एषा.
तया त्वं जीव शरदः सुवर्चा मा त आ सुस्रोद् भिषजस्ते अक्रन्.. (७)
प्राचीन काल में वृत्रासुर के द्वारा घायल इंद्र ने प्यास से व्याकुल हो कर बलकारक अन्न
एवं वृद्धावस्था का विनाश करने वाला यह सत्तू बनाया था. वही अन्न और सत्तू तुझे दिया जा
रहा है. इस के द्वारा तू उत्तम तेज वाला बन कर सौ वर्ष तक जीवित रह. पिया हुआ सत्तू तेरे
शरीर में रह कर बल प्रदान करे. देवों के वैद्य अश्विनीकुमारों ने तेरे लिए यह ओषधि तैयार की
है. (७)
सूक्त-३० देवता—अश्विनीकुमार आदि
यथेदं भूम्या अधि तृणं वातो मथायति.
एवा मथ्नामि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (१)
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