अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
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निवास करके मेरे चित्त के संदेहों को दूर करके मुझमें भी आत्म-दृष्टि को
उत्पन्न कीजिए।" तदनुसार ऋषिजी ने राजा की प्रार्थना को स्वीकार किया
और राजा के साथ आये। उसके बाद राजा ने अपने घर में एक उत्तम
स्थान निश्चित करके एक सिंहासन लगाकर बड़े सत्कार से उसके ऊपर
ऋषिजी को बैठाया और राजा अपने चित्त के संदेहों को पूछने लगा और
अष्टावक्रजी उनका उत्तर देने लगे—इन प्रश्नोत्तरों के द्वारा अज्ञान का
निराकरण और ज्ञान का उदय हुआ। वही ज्ञान इस पुस्तक में मुमुक्षुओं के
लाभार्थ प्रकाशित किया जाता है।
—प्रकाशक
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