अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
Page 346 of 405
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अठारहवाँ प्रकरण । ३३९
भावार्थ ।
हे शिष्य ! देहाभिमानी मूढ़ पुरुष को देह के साथ सम्बन्धवाले जो धन, वेश्या आदिक हैं, उनमें यदि किसी निमित्त से वैराग्य भी उत्पन्न हो जावे, तो भी वह वैराग्य शून्य है, परन्तु जिसका देहादिकों के साथ अभिमान नष्ट हो गया है, उसको देहसम्बन्धी पुत्रादिकों में न राग है, और शत्रु-व्याघ्रादिकों में न विराग है, राग और विराग उसको होता है, जिसको अपने देह का अभिमान है ॥ ६२ ॥
मूलम् ।
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा ।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥
पदच्छेदः ।
भावनाभावनासक्ता, दृष्टिः, मूढस्य, सर्वदा, भाव्य-भावनया, सा, तु, स्वस्थस्य, अदृष्टिरूपिणी ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढस्य= | अज्ञानी की | सा= | दृष्टि |
| दृष्टिः= | दृष्टि | भाव्यभावनया= | दृष्टि की चिन्ता से युक्त हो करके |
| सर्वदा= | सर्वदा | ||
| भावनाभावना-सक्ता= | भावना में या अभावना में लगी हुई है | अपि= | भी |
| अदृष्टिरूपिणी= | दृश्य के दर्शन से रहित रूप- वाली | ||
| तु= | परन्तु | ||
| स्वस्थस्य= | ज्ञानी की | भवति= | होती है ॥ |