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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 309 of 405

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Page 309

३०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

में ही शान्ति को प्राप्त रहता है। वह संकल्पादिक मन के
व्यापारों को नहीं करता है और न बुद्धि के व्यापारों को
करता है, और न वह इन्द्रियों के व्यापारों को करता है,
क्योंकि उसमें कर्त्तत्वादिकों का अभिमान नहीं है ॥ २७ ॥

मूलम् ।

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः ।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्तेमहाशयः ॥ २८ ॥

पदच्छेदः ।

असमाधेः, अविक्षेपात्, न, मुमुक्षुः, न, च, इतरः,
निश्चित्य, कल्पितम्, पश्यन्, ब्रह्म, एव, आस्ते, महाशयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
महाशयः=ज्ञानीनिश्चित्य=निश्चय करके
असमाधेः=समाधि रहित होने सेइदम् सर्वम्=इस सब जगत् को
मुमुक्षुः न=मुमुक्ष नहीं हैकल्पितम्=कल्पित
च=औरपश्यन्=समझता हुआ
अविक्षेपात्=द्वैत भ्रम के अभाव सेब्रह्म एव=ब्रह्मवत्
इतरः न=बद्ध नहीं हैआस्ते=स्थित रहता है ॥
परन्तु=परन्तु

भावार्थ ।

ज्ञानी मुमुक्षु नहीं होता है, क्योंकि विक्षेप की निवृत्ति के लिये
मुमुक्षु समाधि को करता है। ज्ञानी में विक्षेप है नहीं, इसी लिये
वह समाधि को नहीं करता है। उसमें बन्ध भी नहीं है, क्योंकि