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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 306 of 405

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Page 306

अठारहवां प्रकरण । २९९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्= यहइति= इस प्रकार
कर्म= कर्मयः= जो
देहेन= देह करकेचिन्तानुरोधी= चिन्ता करनेवाला
कृतम्= किया गयासः= वह
मया= मुझकुर्वन्= कर्म करता हुआ
शुद्धरूपिणा= शुद्ध-रूप करकेअपि= भी
न= नहींन करोति= नहीं करता है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ज्ञानी ऐसा मानता है कि यह कर्म देह ने किया है, शुद्ध-रूप आत्मा ने नहीं किया है । इसी कारण वह कर्मों को करता हुआ भी कुछ नहीं करता है ।

**प्रश्न—**अज्ञानी पुरुष व्यभिचार कर्मों को करके यदि ऐसा कहे कि यह सब कर्म देह ने किया है, तब उसकी भी मुक्ति होनी चाहिए ?

**उत्तर—**अज्ञानी को कर्मों के फल में अध्यास बना रहता है, क्योंकि शुभ कर्म करने से उसके चित्त में हर्ष उत्पन्न होता है और अशुभ कर्म करने से उसके चित्त में भय और लज्जा उत्पन्न होती है, और व्यभिचार-कर्म करने में छिपाने का प्रयत्न करता है, इस वास्ते उसका निश्चय कच्चा है, वह कदापि मुक्त नहीं हो सकता है, और ज्ञानवान् का व्यवहार उससे उलटा है । शुभ कर्म करने से उसके चित्त में हर्ष नहीं होता है और अशुभ कर्म करने से उसके चित्त में भय और लज्जा नहीं होती है । और व्यभिचार-कर्म करने