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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 301 of 405

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Page 301

२९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
प्रवृत्तौ, वा, निवृत्तौ, वा, न, एव, धीरस्य, दुग्रहः, यदा, यत्, कर्त्तुम्, आयाति, तत्, तिष्ठतः, सुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा =जब कभीतिष्ठतः =समाधिस्थ
यत् =जो कुछ कर्मधीरस्य =ज्ञानी पुरुष को
कर्त्तुम् =करने कोप्रवृत्तौ =प्रवृत्ति में
आयाति =आ पड़ता हैवा =अथवा
तत् =उसकोनिवृत्तौ =निवृत्ति में
सुखम् =सुख पूर्वकदुग्रहः =दुराग्रह
कृत्वा =करकेन एव =कभी नहीं है ॥

भावार्थ ।
विद्वान् को प्रवृत्ति में और निवृत्ति में कोई आग्रह अर्थात् हठ नहीं है । क्योंकि वह कर्त्तृत्वादि अभिमान से रहित है । यदि प्रारब्ध के वश से विद्वान् को प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करने को पड़ जावे, तब वह सुखपूर्वक उनको करता है, और असंग भी बना रहता है । क्योंकि उसको कर्त्तृत्वादिकों का अभिमान नहीं है ॥ २० ॥

मूलम् ।
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः ।
क्षिप्तः संसारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥

पदच्छेदः ।
निर्वासनः, निरालम्बः, स्वच्छन्दः, मुक्तबन्धनः, क्षिप्तः, संसारवातेन, चेष्टते, शुष्कपर्णवत् ॥