Skip to content
SarvaKosh
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 278 of 405

Read in context
Page 278

सत्रहवाँ प्रकरण । २७१

मूलम् ।

निर्ममोनिरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः ।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ १९ ॥

पदच्छेदः ।

निर्ममः, निरहङ्कारः, न, किञ्चित्, इति, निश्चितः, अन्तर्गलितसर्वाशः, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अन्तर्गलितसर्वाशः =अभ्यन्तर में गलित हो गई है सब आशाएँ जिसकी, ऐसा पुरुषन किञ्चित् =कुछ भी नहीं है
इति =ऐसा
निश्चितः =निश्चय करता
निर्ममः =ममता-रहित हैकुर्वन् =कर्म करता हुआ भी
निरहङ्कारः =अहङ्कार-रहित हैन लिप्यते =लिपायमान नहीं होता है

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो विद्वान् 'अहं' मम अभिमान् से शून्य है, अर्थात् 'यह मैं हूँ' और 'यह मेरा है', इस प्रकार के अभिमान से भी जो रहित है, और अधिष्ठानचेतन से अतिरिक्त किंचित् भी सत्य नहीं है, ऐसे निश्चयवाला जो पुरुष है, वह सर्व व्यवहारों को करता हुआ भी कुछ नहीं करता है । क्योंकि उसको कर्तृत्व अभिमान नहीं है ॥ १९ ॥