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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 209 of 405

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Page 209

२०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

द्वेष हैं, उनसे जो रहित है और प्रारब्धकर्म्मों के वशीभूत
होकर विषयों का चिन्तन भी करता है, और भोगता भी
है, उसको हानि-लाभ कुछ नहीं है । इसी में दृष्टान्त को
कहते हैं—
जैसे निद्रा के वश जो पुरुष शून्यचित्त होकर सो रहा
है उसको किसी पुरुष ने जगाकर उससे कहा कि तू इसकाम
को कर । वह जागकर उस काम को तो करता है, परन्तु
अपनी इच्छा के अनुसार नहीं करता है, किन्तु दूसरे पुरुष
की प्रेरणा करके वह काम को करता है ।

दाष्टान्त ।

इसी प्रकार जो पुरुष शान्तचित्त है, वह भी प्रारब्धवश
से विषयों को भोगता है, अपनी इच्छा से नहीं भोगता है
और जैसे कोई पुरुष अपने आनन्द में बैठा है, किसी सिपाही
ने आकर उसको बिगारी पकड़कर उसके शिर पर गठरी
रखवाया और वह पुरुष गठरी को उठाकर ले जाता है ।
यदि न उठावे या कहीं धर देवे, तो सिपाही उसके कमची
मारे । वह अपनी खुशी से उठाकर नहीं ले जाता है, किन्तु
दूसरे की प्रेरणा से वह उठाकर लिये जाता है, वैसे ही
ज्ञानवान् भी अपनी खुशी से तो विषय-भोगों को नहीं भोगता
है, परन्तु प्रारब्धरूपी सिपाही की प्रेरणा करके भोगता है,
इसलिये उसको हानि-लाभ कुछ भी नहीं है ॥ १ ॥

मूलम् ।

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥