Skip to content
SarvaKosh
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

Page 99 of 144

Read in context
Page 99

अनुरागसागर वाणी

99

निरंजन ने कहा

दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ।
पुरुष शाप सो कहैं अस दीन्हा । लच्छ जीव नित ग्रासन कीन्हा ॥
तुमहू कृपा मो पर करहू । माँगो सो वर मुहि उच्चरहू ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनहु युग शरण जीव थोरे जाहीं ॥
चौथा युग जब कलियुग आवे । तब तुव शरण जीव बहु जावे ॥
ऐसा वचन हार मुहिं दीजे । तब संसार गवन तुम कीजे ॥

निरंजन ने कहा कि एक कृपा करो, परम पुरुष ने मुझे एक लाख जीव रोज खाने का शाप दिया है, इसलिए मुझे कृप्या एक वर दो कि सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में आप थोड़े-2 जीव ही ले जायेंगे और जब कलियुग आयेगा तो बहुत सारे जीव ले जाना।

साहिब ने कहा

अरे काल परपंच पसारा । तीनों युग जीवन दुख डारा ॥
विनती तोरि लीन्ह मैं जानी । मो कहैं ठग काल अभिमानी ॥
जस विनती तू मोसन कीन्ही । सो अब बकसि तोहि कहैं दीही ॥
चौथा युग जब कलियुग आये । तब हम आपन अंश पठाये ॥

साहिब ने कहा कि तूने षड्यन्त्र रचकर तीन युग जीवों के लिए दुखदायी कर दिये, पर तुमने विनती की, इसलिए मैंने तुम्हें माफ़ कर तुम्हारी विनती मान ली, पर जब कलियुग आयेगा, तो मैं अपने अंश भेजूँगा।

अंश ब्यालिस पुरुष के, जीव कारण आवई ।

कलि पंथ प्रगट पसारि के, वे जीव लोक पठावई ॥

कहा- परम पुरुष के ब्यालिस अंश जीवों के कल्याण हेतु आयेंगे और अपना पंथ चलाकर जीवों को अमर लोक ले जायेंगे।

निरंजन ने कहा

वचन तुम्हार लीन्ह मैं मानी । विनती एक करों तुहि ज्ञानी ॥
पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीव लै सत लोक पठाऊ ॥
द्वादस पंथ करों मैं साजा । नाम तुम्हार ले करों अवाज़ा ॥