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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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साहिब ने कहा कि तुम तप्त शिला पर जीवों को भून-2 कर खा रहे हो, उन्हें अपार कष्ट दे रहे हो, इसलिए परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाऊँगा।

निरंजन ने कहा

तबै निरंजन बोले बानी। कैसे हंस छुड़ावो ज्ञानी ॥
जग के माहिं कीन्ह हम बासा। पशु पंछी जल थल में आसा ॥
तिनसौ साठ हम पैठ लगाहीं। तामें सकल जीव उरझाहीं ॥
तापर काम क्रोध हम डारी। तृष्णा सकल जीव कहँ मारी ॥
तापर कीन्हों एक हम काजा। पाप पुण्य थापे हम राजा ॥
इनमें जीव बंधे सब झारी। कैसे हंसहि लेव उबारी ॥

निरंजन ने कहा कि जीवों को कैसे छुड़ा ले जाओगे! कहा- मैं ही सब में समाया हुआ हूँ। (मन रूप में निरंजन सबके अन्दर बैठा है) फिर तीन सौ ऐसे स्थान हैं, जहाँ मैंने पैठ लगायी हुई है, (360 ऐसे स्थान हैं जहाँ निरंजन ने थोड़ी-2 शक्तियाँ रखी हुई हैं, खुद बैठा हुआ है) सभी उनमें उलझे हैं, इस पर भी मैंने सबको काम, क्रोध, तृष्णा आदि से मारा हुआ है, बेहाल किया हुआ है। फिर मैंने पाप-पुण्य में जीव को बाँध दिया है, तुम उन्हें कैसे छुड़ाओगे!

साहिब ने कहा

सत्त शब्द हम बोले बानी। बचन हमारे छूटे प्राणी ॥
गहै शब्द जब मन चित्तलाई। भजिहै काल जिव लेब छुड़ाई ॥

साहिब ने कहा कि मैं सत्य कह रहा हूँ, जब जीव मेरे शब्द को पकड़ लेगा, वो छूट जायेगा।

निरंजन ने कहा

तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥
तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ॥