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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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शाप से ग्रसित हुए सब

जब तीनों ने झूठ बोला तो अद्या शक्ति चिंतित हुई, उसने ध्यान में निरंजन से पूछा—

निरंजन ने कहा

अलख निरंजन अस प्रण भाखी। मोकहँ कोउ न देखै आँखी ॥
ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी। अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥
ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन। ध्यान माहिँ अस कहो
निरंजन ॥

आद्य शक्ति ने तब ध्यान में निरंजन से पूछा कि क्या इन्होंने तुम्हारा दर्शन किया! निरंजन ने भी ध्यान में कहा कि ये झूठ बोल रहे हैं, मुझे किसी ने नहीं देखा।

ब्रह्मा मोर दरश नहिं पाया। झूठी साखि इन आय दिवाया ॥
तीनों मिथ्या कहे बनाई। जनि मानहु ये हैं लबराई ॥

निरंजन ने कहा कि ब्रह्मा ने मेरा दर्शन नहीं पाया और इनसे झूठी गवाही दिलवायी है। ये तीनों झूठ बोल रहे हैं।

माता ने तीनों को शाप दिया

यह सुनि माता कीन्हँ दापा। ब्रह्मा को तब दीन्हों शापा ॥
पूजा तोरि करै कोई नाहीं। जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा। नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥
आगे है जो शाख तुम्हारी। मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रगट करहिं बहु नेम अचारा। अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्त सों करहिं हँकारा। ताते परि हैं नरक मँझारा ॥

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