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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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करि प्रणाम सम्मुख रहे जाई। माता सब पूछी कुशललाई।।

कहु ब्रह्मा पितु दरसन पाये। दूसरि नारि कहाँ से लाये।।

तीनों ने माता के सम्मुख जाकर प्रणाम किया। माता ने कुशल पूछी, और कहा—हे ब्रह्मा! क्या तुमने पिता का दर्शन पाया और यह दूसरी नारी कहाँ से लाए!

ब्रह्मा ने कहा

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी। परस्यो सीस देख इन आँखी।।

ब्रह्मा ने माता से कहा कि ये दोनों गवाह हैं कि मैंने पिता के दर्शन किये और उनके शीश का स्पर्श किया।

माता ने गायत्री से पूछा

तब माता बूझे अनुसारि। कछु गायत्री बचन विचारी।।

तुम देखा इन दर्शन पावा। कहो सत्य दर्शन परभावा।।

माता ने गायत्री से पूछा कि कहो, क्या ब्रह्मा ने दर्शन किये!

गायत्री ने कहा

तब गायत्री बचन सुनावा। ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा।।

मैं देखा इन परसेठ शीशा। ब्रह्माहि मिले देव जगदीशा।।

गायत्री ने झूठी गवाही देते हुए कहा कि ब्रह्मा ने पिता के दर्शन किये, मैंने देखा कि इसने पिता के शीश को स्पर्श भी किया।

लेइ पुहु प परसेठ सीस पितु, इन दृष्टि मैं देखत रही।।

जल ढार पुहु प चढ़ाय दीन्ह, हे जननि यह है सही।।

पुहुपते पुहुपावती भयी, प्रगट ताही ठामते।।

इनहु दरसन लह्यो पितु को, पूछहू इहि पुहु पावती।।

सबही साँच मैं तोसो कहूँ, नहिं झूठ हैं एको रती।।