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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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ब्रह्मा ने कहा कि तुम्हारा पति कौन है, कृपा करके सच-2 कहो, छिपाओ नहीं, बताओ कि हमारा पिता कहाँ है !

शक्ति ने कहा

कहे जननि सुनो ब्रह्मा, कोउ नहीं जनक तुम्हार हो ।

हमहिते भई सबे उत्पत्ति, हमहिं सब कीन सम्हार हो ॥

माता ने कहा-हे ब्रह्मा ! तुम्हारा पिता कोई नहीं है, मुझसे ही तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, इसलिए मैं ही तुम्हारी माता हूँ और मैं ही तुम्हारा पिता हूँ ।

ब्रह्मा ने कहा

ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननि तैं चित्त दे ।

कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥

ब्रह्मा ने कहा-हे माता ! ध्यान से सुनो, वाणी में आ रहा है कि एक पुरुष है, जो गुप्त है । ब्रह्मा ने दिखाया माता को ।

शक्ति ने कहा

कहे अद्या सुनु ब्रह्म कुमारा । मोसे नहीं कोउ स्रष्टा न्यारा ॥

स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुद्र हम निरमाई ॥

शक्ति ने कहा कि मैं ही स्रष्टा हूँ, मैंने ही स्वर्ग, पाताल, मृत्यु आदि लोक बनाए हैं, मैंने ही समुद्र बनाया है, मेरे अलावा और कोई नहीं है ।

ब्रह्मा ने कहा

माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥

जबै वेद मुहि कहै बुझाई । अलख निरंजन पुरुष बताई ॥

अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया बिचारा ॥

जो तुम वेद आप कथ राखा । सो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥