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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

पुनि तुम मथहु सिंधु कहँ जाई। जो जिहि मिले लेहु सो भाई॥
कीन्ह चरित अस आदि भवानी। कन्या तीन कीन्ह उत्पानी॥
कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं। अंस वारि महँ नायो सबहीं॥
पठयो सिंधु माहिँ पुनि ताहीं। त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं॥
पुनि तिन मंथन सिंधु को कीन्हा। भैंट्यो कन्या हरित है लीन्हा॥
कन्या तीनहु लीन्हे साथा। आ जननी कहँ नायउ माथा॥
सब माता के आगे कीन्हा। माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा॥
माता कहै सुनहु सुत मोरा। यह तो काज भये सब तोरा॥
एक एक बाँटि तीन्हु को दीन्हा। करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा॥
सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ। है लक्ष्मी विष्णु कहँ देऊ॥
पारवती शंकर कहँ दीन्ही। ऐसी माता आज्ञा कीन्ही॥
तीनउ जन लीन्ही सिर नाई। दीन्ह अद्या जस भाग लगाई॥
पाई कामिनी भये अनंदा। जस चकोर पाये निशिचदा॥
काम वसी भए तीनों भाई। देव दैत दोनों उपजाई॥
धरमदास परखो यह बाता। नारी भयी हती सो माता॥

माता ने पुत्रों से कहा कि पुनः समुद्र मंथन के लिए जाओ और जो जिसे मिले, वो उसे अपने पास रख ले। इतने में शक्ति ने तीन कन्याओं की उत्पत्ति की और उन्हें भी समुद्र में समाने को कहा। तीनों बेटों में से किसी को भी इसका भेद मालूम न चला। जब तीनों ने पुनः समुद्र मंथन किया तो तीनों कन्याएँ मिलीं। तीनों कन्याएँ लेकर तीनों माता के पास आए। माता ने कहा कि यह सब तुम्हारा काम है, इसलिए एक-एक कन्या सबको दे दी और एक दूजे के संग रहने को कहा। सावित्री ब्रह्मा जी को दी, लक्ष्मी विष्णु जी को और पार्वती शंकर जी को दी। स्त्री पाकर तीनों भाई बड़े खुश हुए। जैसे चकोर को रात्रि का चाँद मिल गया