अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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उदर फारि के बाहर आवे । कूर्म उदर विदार फल पावै ॥
धर्मराय सों कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥
जाकर रहो धर्म वहि देशा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरे शा ॥
परम-पुरुष ने योगजीत (कबीर साहिब) को बुलाया। वास्तव में परम-पुरुष खुद ही योगजीत हुए। उन्होंने स्वयं को मथ ज्ञानी पुरुष कबीर साहिब को निकाला और कहा कि निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो, अब वो मेरे देश में कभी भी नहीं आयेगा। उसके पेट में आद्य-शक्ति है, उससे कहना कि मेरा ध्यान करके उसके पेट को फाड़ बाहर आ जाए ताकि निरंजन ने जो कूर्म का पेट फाड़ा था, उसे उसका फल मिल जाए और निरंजन से कहना कि वो स्त्री अब तुम्हारी हो गयी, तुमने जहाँ स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक और पाताल लोक की रचना की है, वहाँ जाकर रहो।
जोगजीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥
जोगजीत को देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥
पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥
परम-पुरुष को प्रणाम कर योगजीत मानसरोवर में आए। जब निरंजन ने योगजीत को देखा तो बड़ा क्रोध किया, भयंकर हो गया, पूछा-कौन हो? और यहाँ क्यों आए हो?
जोगजीत अस कहै पुकारी । अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी ॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारो तोही ॥
जोगजीत कन्या को कहिया । नारि काहे उदर महँ रहिया ॥
उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तोहि ठाहर ॥
योगजीत ने कहा कि तुमने आद्य-शक्ति को निगल लिया है, परम-पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, तुम्हें यहाँ से निकालना है। तब योगजीत ने कन्या से कहा कि इसके पेट में क्यों बैठी हो, परम-पुरुष की सुरति करके इसका पेट फाड़कर बाहर आ जाओ।