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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

गुरु दयाल तो पुरुष दयाला। जेहि गुरुमुख छुए न काला॥
जीव कहो परमारथ जानी। जो गुरु भक्त ताहि नहिं हानी॥
कोटिक योग अराधे प्रानी। सतगुरु बिन जीव की हानी॥
सतगुरु अगम गम्य बतलावे। जाकी गम्य वेद नहिं पावे॥
वेद जाहि ते ताहि बखाने। सत्य पुरुष का मरम न जाने॥
कोई इक हंस विवेकी होवे। सत्य शब्द जो गही बिलोवे॥
कोटि माहिं कोइ संत विवेकी। जो मम बानी गहे परे खी॥
फंदे सबै निरंजन फंदा। उलटि न निज घर चीन्हे मंदा॥


गुरु गुरुन में भेद विचारा। गुरु-2 कहे सकल संसारा॥
गुरु सोइ जिन शब्द लखाया। आवागमन रहित दिखलाया॥
गुरु सजीवन शब्द लखावे। जाके बल हंस घर जावे॥
सो गुरु सों कछु अन्तर नीहीं। गुरु औ शिष्य मता एक आहीं॥

कहा-यदि ऐसा गुरु मिल जाए तो उसमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं मानना।

अनुरागसागर ग्रंथ कथि तोहि अगम गम्य लखाइया॥
पुरुष लीला काल को छल सबै वरनि सुनाइया॥
रहनि गहनि संत की, जौहरी जन बूझिहैं॥
परखि बानी जो गहे, तेहि अगम मारग सूझिहैं॥