अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब बन्दगी
रति सुरति सो गरभ जो भयऊ। चूरामनि दास बास तहँ लयऊ॥
धरमदास परवाना दीन्हा। आमिन आय दंडवत कीन्हा॥
दसों मास जब पूजी आसा। प्रगटे अंश चूरामणि दासा॥
तब साहिब उसके घर गये और कहा कि अब तुम्हारे 42 वंश होंगे।
फिर उनकी शाखाएँ, परशाखाएँ होंगी, सकल जीवों को वे तारेंगे।
तुमते वंश बयालिस होई। सकल जीवकहँ तारै सोई॥
तिनसों साठ होइ हैं शाखा। तिन शाखन ते होइ हैं परशाखा॥
दश सहस्र परशाख तुम है हैं। वंशन साथ सबै निरनहिहैं॥
नाता जान करे अधिकई। ताकहँ लोक बदों नहिं भाई॥
जस तुम्हार हुइ है कडिहारा। तैसे जानो साख तुम्हारा॥
कहा कि 42 वंश से आगे 360 शाखाएँ होंगी, फिर उसकी 10
हजार परशाखाएँ होंगी। जैसे मैंने तुम्हें नाम परवाना सोंपा है, वैसे ही
तुम्हारे वंशों को भी सोंपा जायेगा। वो सब नाद पुत्र होंगे, शब्द पुत्र होंगे।
ताते तोहि कहौं समझाई। अपने वंसन देहु चिताई॥
नाद पुत्र जो परगट होई। ताको मिलै प्रेम से सोई॥
तुमहु नाद पुत्र मम आहु। यह मन परखहु धर्मनि साहु॥
कमाल पुत्र जो मूत्र जियावा। ताके घट में दूत समावा॥
पिता जानि तिन आहंग कीन्हा। तब हम थाति तोहि कहँ दीन्हा॥
हम हैं प्रेम भगति के साथी। चाहों नहीं तुरी औ हाथी॥
प्रेम भक्ति से जो मोहिं गहिहैं। सो हंस मम हृदय समैहैं॥
अहं कारते होतेऊ राजी। तौ मैं थापत पंडित काजी॥
अधीन देखि थाति तेहि दीना। देखेउ जब तोहिउँ प्रेम अधीना॥
ताते धरमनि मानु सिखाई। नाप थाती सौँपिहु भाई॥
नाद पुत्र कहँ सौँपिहु सोई। पंथ उजागर जासों होई॥
बंस करिहैं अहं कार बहुता। हम हैं धर्मदास कुल पूता॥