अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Page 117 of 144
Read in contextद्वापर में आए साहिब
द्वापर युग प्रवेश भा जबही । पुरुष अवाज् कीन्ह पुनि तबही ॥
ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । यम सों जीवन करहु उबारा ॥
काल देत जीव कहँ त्रासा । काटो जाय तिनहिं को फाँसा ॥
द्वापर में पुनः परम पुरुष ने साहिब को बुलाकर कहा कि संसार में जाओ और काल से जीवों को छुड़ाओ, वो जीवों को कष्ट दे रहा है ।
तब हम कहा पुरुष सों बानी । आज्ञा करहु शब्द परवानी ॥
कालहिं मेटि जीव लै आवो । बार-2 का जगहिं सिधावो ॥
साहिब ने तब परम पुरुष से कहा कि काल को मार सब जीवों को ले आता हूँ, बार-2 क्या भवसागर में जाना ।
कहा पुरुष सुनो हो ज्ञानी । शब्द चिताय जीव मुक्तानी ॥
जो अब कालहिं मेटो जाई । हो तबहिं मम वचन नसाई ॥
सहज भाई जग प्रगटहु जाई । जब लग जीव काल बस भाई ॥
हमसों तुमसों अन्तर नाही । जिमि तरंग जलमाहिं समाहीं ॥
हम है तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट जम सब करिहैं थाना ॥
जाहु बेगि तुम वा संसारा । जीवन खेइ उतारहु पारा ॥
परम पुरुष ने साहिब से कहा कि यदि अब काल को मिटाया तो मेरा शब्द कट जायेगा, इसलिए जब तक जीव काल के फंदे में हैं, तुम सहज
भाव से संसार में प्रगट होकर उन्हें चिताते रहो, मुझमें और तुममें कोई भेद नहीं है, जो मुझमें और तुममें कोई अन्तर मानेगा, उसके अन्दर काल निवास करेगा। अच्छा, अब जल्दी से संसार में जाओ और जीवों की जीवन रूपी नैया खेवकर उन्हें पार लगाओ ।
चले तब हम माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जग माहिं सिधायी ॥
करुणामय तब नाम धराया । द्वापर युग जब महि में आया ॥
117