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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब आये संसार में

धर्मराय उठ सीस नवायो । तबहिँ हम संसार सिधायो ॥

निरंजन ने तब उठकर साहिब को प्रणाम किया और साहिब संसार में आए।

आये जहाँ यम जीव सतावे । काल निरंजन जीव नचावे ॥

चटपट करे जीव तहाँ भाई । ठाढे भये तहाँ पुनि जाई ॥

मोहि देख जीव कीन्ह पुकारा । हे साहिब मुहि लेहि उबारा ॥

तब हम सत्य शब्द गुहरावा । पुरुष शब्द ते जीव जुड़ावा ॥

साहिब तप्त शिला पर आए, जहाँ निरंजन जीवों को कष्ट दे रहा था, भून-2 कर खा रहा था। साहिब को देख जीवों ने पुकार की कि हमें छुड़ाओ। तब साहिब ने सत्य शब्द पुकारा, जिससे तप्तशिला ठण्डी हो गयी, जीव शांत हो गये।

सकल जीव तब अस्तुति लाये । धन्य पुरुष भल तपन बुझाये ॥

यम ते छोर लेव तुम स्वामी । दया करो प्रभु अन्तरयामी ॥

सब जीवों ने साहिब से पुकार की, कहा-हे प्रभु! हमें छुड़ाओ।

तब मैं कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसायी ॥

जब तुम जाय धरौ जग देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥

देह धरी सत शब्द समाई । तब हँसा सत लोकै जाई ॥

जहाँ आशा तहाँ वासा होई । ताको टार सका न कोई ॥

जब तुम देह धरो जग जायी । बिसर्यो पुरुष काल धरि खाई ॥

साहिब ने कहा कि यदि ऐसे ही जबरन ले जाऊँगा तो मेरा शब्द कट जाएगा, जो निरंजन को दे चुका हूँ, इसलिए जब तुम मानव तन में जाओगे तो मेरे शब्द से प्रीत करना, जिस देही में मेरा नाम आ जायेगा,

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