श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
DevanagariHindipublished811 pages
Page 96 of 811
Read in contextPage 96
८० | आनन्दरामायणे | [सर्गः २
ज्ञात्वा साऽपि बलं तस्य स्तुत्वा तं प्रययौ दिवम्. अथाब्धिवचनान्मार्गे मैनाकः पर्वतो महान् ॥ ५ ॥
जलमध्यात्प्रादुरभूद्विश्रान्त्यर्थे हनूमतः । नानामणिमयैः शृङ्गैरभ्रम्पोषपरि नगत्कुतिः ॥ ६ ॥
धृत्वा यान्तं हनूमन्तं प्राह मैनाकपर्वतः । आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि च ॥ ७ ॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् पुरा गिरीणामिंद्रेण युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥ ८ ॥
तदा दशरथेनाहं मोचितोऽस्म्यत्र संस्थितः अतस्तदुपकारं हि निस्तर्तुं निर्गतोऽस्म्यहम् ॥ ९ ॥
गच्छतो रामकार्यार्थं तव विश्रान्तिहेतवे तदा तं हनुमानाह रामकार्ये न मे श्रमः ॥१०।
विश्रामः स्वामिकार्येऽत्र न कर्तव्यश्च भक्षणम् । मैनाकस्त्वं पुनः प्राह स्वस्पर्शात्पावयस्व माम् ॥११
तथेति स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः । किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥१२
सिंहिकानाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता मदा। आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षती ॥१३।
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ।.१४।
एवं विचिन्त्य हनुमानधो दृष्टिं प्रसारयन् । तत्र दृष्ट्वा सिंहिकां तां तदस्ये न्यपतत्कपिः । १५।
तस्यांत्रजालं निष्कास्य तां हत्वाऽग्रे ययौ पुनः ततोऽब्धेर्दक्षिणे कूले लंकां कृत्वा तु पार्श्वतः ॥१६॥
पपात पर्लकार्या तत्र तां रावणस्वसाम् । क्रौञ्चा हन्त्वा सिंहिकावल्लङ्कां रात्रौ विवेश सः ।।१७।
तदा लङ्कापुरी नाम्नी राक्षसी तं व्यतर्जयत् । हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽजयदाहनन् १८॥
तदा स्मृत्वा ब्रह्मवाक्यं सा प्राहाश्रुमुखी हरी । ब्रह्मणोक्ता पुरा चाहं यदा त्वां धर्षयेत्कपिः १९।
तदा रामो रावणस्य वधार्थमत्र यास्यति । ज्ञातं मया रावणस्य वधं रामः करिष्यति ।.२०॥
निर्विघ्नया गच्छ लंकामशोके पश्य जानकीम् ततो विवेश हनुमाल्लङ्कां पश्यन्ययौ तदा । २१॥
पार बाहर निकल आये ॥४। तब सुरसा उनका बल जान और स्तुति करके स्वर्गको चली गयीं।
पश्चात् समुद्रके कहनेसे महान् मैनाक पर्वत जलके बीचमेंसे हनुमान्के विश्रामके लिये आधसर द का उठ
खड़ा हुआ। नाना मणिमय शिखरोंक ऊपर मनुष्यका रूप धारण करके मैनाक पर्वत शाल द्वार हनुम त्सं
बोला कि आइए और मरे अमृतकल्प फलोंको खाइए । ५-७। तब ओसू क्षणभर विश्रामकरके सुखपूर्वक
आगे जाइयेगा। पूर्वसमय पर्वतोंका इन्द्रके साथ दारुण युद्ध हुआ था ॥ ८ । उस समय राजा दशरथने मुझे
बचाया था तबसे मै यहाँ आकर रहता हूँ। मै उनके उपकारके उऋण होनेके लिये ही आपके सामने
उपस्थित हुआ हूँ । ९। सो इसलिये कि रामकार्यके लिये जाते हुए आप मेरे ऊपर विश्राम करके जायें तब
मम हनुमान्ने कहा कि क्या रामके कार्यमें मुझे श्रम होगा ? और स्वामीके कार्यमें तो सदा विश्राम ही
रहता है। इसलिये मैं यहाँ ठहरकर भोजन आदि नहीं कर सकता । तब फिर मैनाकने कहा-अच्छा, कृपया आप
अपने हाथसे स्पर्श करके तो मुझे पवित्र कर दे १०, ११। 'तथास्तु' कह हनुमान्ह ने उसके शिखरका छूकर
चल पड़े। जब कुछ दूर आये बहत उनकी छायाको किसी छायाग्रहने पकड़ लिया । १२। वह सिंहिका
नामकी घोर राक्षसी थी। जो सदा जलमें रहा करती थी और आकाशमार्गसे उड़ते हुए पक्षियोंकी छाया
पकड़कर खींच लेती और खा जातीथी १३। उसके पकड़नेपर बलवान् हनुमान् सोचने लग कि किसने रामके
काममें विघ्न डालकर किया भंग कर रोक दिया । १४ । यह विचारकर हनुमान्ने नीचे दृष्टि की ता सिंहिका
राक्षसीको देखकर उसके मुखम ही कूद पड़े ॥१५॥ उन्होने उसका आंत निकाल ली और उसे मार डाला।
यहाँसे आगे बढ़ तो समुद्रके दक्षिण किनारे स्थित लङ्काको बगलमें स्थित परलङ्कामे जा पहुँचे । यहाँ
रावणकी लड़की क्रौञ्चानां सिंहिकाके ही समान मारकर रात्रिके समय लङ्कामें प्रवेश किया ।। १६ ।। १७।
तब उन्ह लङ्का नामकी राक्षसी डाँटने लगी । हनुमन्तने उसको भी अवहेलासे बायें हाथका एक मुक्का मारा
॥ १८ । उस समय ब्रह्माके वाक्यका स्मरण करके लङ्का आँखोस आँसू भरकर बोली कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने
मुझस कहा था कि जब कोई वानर तेरा अपमान करेगा ॥ १९ ॥ तब राम रावणका वध करनेके लिए यहाँ