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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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Page 811

७९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं प्रोक्तं मया ते गिरिजे सविस्तरम् ।
संस्मृत्य पापापहरं निरन्तरं मनोहरं लप्स्यसि राघवे मतिम् ॥८३॥

आदौ हत्वा दशास्यं द्विजवचनपुरस्त्वेन यात्राश्च यज्ञान्
कृत्वा भुक्त्वातिभोगानवनितलविशीर्णां गृहीत्वाऽथ सीताम् ।
लब्ध्वा नानावस्तुपास्तान्त्यजनिमगतान्पार्थिवादींश्च जित्वा
कृत्वा नानोपदेशान् गजपुरनिकटे स्वार्थलोकं जगाम ॥८४॥

वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान्पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वायव्यकोणादिषु ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥८५॥

आनन्दरामायणहारदीपमं ये पूर्णकाण्डं चरमं नरोत्तमाः ।
पठंति शृण्वंति हरेः परं पदं गच्छंति पूर्णेप्सितमालभंति ते ॥८६॥

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं जप्यं पवित्रं श्रवणीयमादरात् ।
यन्मङ्गलानामति मङ्गलप्रदं स्मरामि नित्यं प्रणमामि सादरम् ॥८७॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे उमामहेश्वर-संवादे तथा रामदासविष्णुदाससंवादे ग्रंथसंख्याकीर्तनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


मादिका श्रवण, इनमेंसे एक भी नहीं है ॥ ८२ ॥ हे गिरिजे ! मैंने विस्तारपूर्वक यह उत्तम आनन्द-रामायण तुम्हें सुना दिया। तुम इस पापापहारी चरित्रका निरन्तर मनन किया करो। ऐसा करनेसे तुम्हें सुन्दर भगवद्भूति प्राप्त होगी और तुम्हारी बुद्धि रामकी ओर दौड़ पड़ेगी ॥ ८३ ॥ रामने पहले रावणका वध किया। फिर ब्राह्मणके वचनका सम्मान करते हुए तीर्थोंकी यात्रायें कीं और बहुतसे यज्ञ किये। फिर विविध प्रकारके भोगोंको भोग करके पातालमें जाती हुई सीताको उबारा। तदनन्तर पृथ्वीतलके अनेक राजाओंको जीतकर बहुत सा वस्तुरत्न लाये। तत्पश्चात् लोगोंको विविध प्रकारका उपदेश देकर वे हस्तिनापुरके समीप गंगातटसे अपने परम धामको चले गये ॥ ८४ ॥ जिन रामचन्द्रजीके वाम भागमें सीता, आगे हनुमान्जी, पीछे लक्ष्मण, शत्रुघ्न तथा भरत, दायें-बायें एवं वायव्य आदि कोणोंमें सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् विराजमान हैं। उन सबके मध्यमें नीलकमलकी नाईं सुशोभित श्यामवर्ण श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ ८५ ॥ जो लोग हारकी भाँति सुन्दर इस अन्तिम पूर्णकाण्डका पाठ करते या सुनते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं और उनकी सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं ॥ ८६ ॥ लोगोंको चाहिए कि इस पवित्र आनन्दरामायणका आदरपूर्वक कीर्तन तथा श्रवण किया करें। क्योंकि यह मङ्गलोंका भी मङ्गल-दाता है। इसी कारण मैं तो नित्य इसका आदरपूर्वक स्मरण और नमन करता हूँ ॥ ८७ ॥ इति श्रीशतकोटि-रामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे गोण्डामण्डलान्तर्गतसिसई (टिकरिया) ग्रामनिवासि पं० रामदत्तात्मज पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

॥ इति पूर्णकाण्डं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
समाप्तोऽयं ग्रन्थः

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